॥ सोमवार व्रत कथा ॥
» सोमवार व्रत की विधि
* सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारण का कोई खास नियम नहीं है किन्तु यह आवश्यक है कि दिन रात में केवल एक समय भोजन करें ।
* सोमवार के व्रत में शिवजी पार्वती का पूजन करना चाहिए| सोमवार के व्रत तीन प्रकार के हैं - साधारण प्रति सोमवार, सौम्य प्रदोष और सोलह सोमवार विधि तीनों की एक जैसी है।
* अधासेर गेहूं का आटा के तीन अंगा बनाकर घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में शंकर जी का पूजन करें। शिव पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए। एक अंगा शिवजी को अर्पण करें । दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें ।
* सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर, घी और गुड़ बनाकर चूरमा बनायें, भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें ।
॥ सोमवार व्रत कथा - १॥
बहुत समय पहले, एक गांव में एक बहुत ही धनवान साहूकार रहा करता था। संतान के लिए साहूकार प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था। साहुकार के इस भक्तिमय अंदाज को देखकर पार्वती मां उससे अत्यधिक प्रसन्न हो भगवान शिव से कहा कि वह साहूकार की इच्छाओं को पूरा कर दे। इस पर भगवान शिव ने कहा कि एक प्राणी अपने कर्मों का फल उसके जीवन में भोग कर जाता है। किन्तु मां पार्वती के ममता-मई स्वभाव को देखकर शिवजी उनकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हो गए। शिव जी ने साहूकार को पुत्र का वरदान दिया और कहा कि साहूकार का पुत्र सिर्फ 12 साल तक जीवित रहेगा। साहूकार दोनों की बातों को सुन ना ही खुशी जताई और ना ही दुख। पहले की तरह वह अभी भी भगवान शिव की पूजा बहुत ही श्रद्धा भाव से करता रहा।
कुछ समय बाद उसे पुत्र प्राप्ति हुई। धीरे-धीरे समय बीतता गया और उसका पुत्र 11 वर्ष का हो गया था। साहूकार ने अपने पत्नी के भाई को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह उसके पुत्र को काशी ले जाए और वहां उसे विद्या प्राप्त करवाए। साहूकार ने अपने पुत्र के मामा को झोली भर के धन दिया और कहा कि रास्ते में जाते-जाते तुम यज्ञ करवाते जाना और ब्राह्मणों को भोजन करवाना और दक्षिणा देना।
साहूकार का आदेश मिलते ही मामा और भांजे काशी जाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने यज्ञ करवाया और ब्राह्मणों को भोजन करवाने के साथ दक्षिणा भी दिया। रास्ते में एक गांव आया जहां का राजा अपनी बेटी की शादी करवाने की तैयारियां कर रहा था। जिस राजकुमार से राजा की बेटी की शादी होनी थी वह काना था । यह बात राजा को नहीं बताई गई थी।
राजकुमार के पिता ने साहूकार के बेटे को देख एक तरकीब सोची। उसने विवाह के समय अपने बेटे की जगह साहूकार के बेटे को बिठा दिया। साहूकार का बेटा ईमानदार था, उसने राजा की बेटी के दुपट्टे पर सारी बात लिख दी। यह पढ़कर राजकुमारी ने अपने पिता को सारी बात बता दी जिसकी वजह से बारात को वापस जाना पड़ा।
कुछ दिनों बाद मामा और भांजे काशी पहुंच गए। जिस दिन साहूकार का बेटा १२ साल का होने वाला था उस दिन भी यज्ञ कराया गया। थोड़ी देर में साहुकार के बेटे ने अपने मामा से कहा कि उसकी तबीयत खराब लग रही है और वह अंदर सोने जा रहा है। भगवान शिव ने साहकार के बेटे के विधि में जो लिखा था ठीक वैसा ही हुआ। अपने भांजे को मृत पाकर मामा रोने लगा। उसी दौरान मां पार्वती और भगवान शिव वहां से जा रहे थे, अपने रास्ते में माता पार्वती ने शिवजी से कहा कि यह इंसान बहुत कष्ट में दिख रहा है, आप इसके सभी कष्ट दूर कर दीजिए।
जब भगवान शिव ने कहा कि मेरे कहे अनुसार इस बालक ने अपने १२ वर्ष पूरे कर लिए हैं। मां पार्वती ने ममता दिखाते हुए महादेव से बालक की आयु बढ़ाने के लिए आग्रह किया तो भगवान शिव ने साहूकार के बेटे के जीवन को बढ़ा दिया । काशी से अपनी शिक्षा पूरी कर वे वापस अपने गांव की ओर जाने लगे। रास्ते में वही गांव आया जहां उसकी शादी कराई गई थी। उसी दौरान राजा को साहूकार का बेटा दिखा । राजा मामा और भांजे को अपने महल ले गया और वहां से उनके साथ अपनी बेटी को विदा कर दिया।
साहूकार और उसकी पत्नी अपने बेटे की राह देख रहे थे। उन्होंने यह सोच रखा था कि बेटे के मृत होने की खबर आती है तो वह अपनी जान दे देंगे। किन्तु उनका बेटा सही सलामत अपने घर आया था, उस रात साहूकार के सपने में भगवान शिव जी ने दर्शन दिए थे। भगवान शिव जी ने कहा कि वह साहूकार के व्रत और कथा सुनने से बहुत खुश हुए थे इसीलिए उन्होंने उसके पुत्र के जीवन काल को बढ़ा दिया था। इसीलिए कहा जाता है कि सोमवार का व्रत करने से और पूजा के बाद कथा सुनने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
॥ सोलह सोमवार व्रत कथा - २॥
अमरावती नगरी के राजा ने शिव मंदिर बनवाया था, एक समय श्री महादेवजी पार्वती के साथ भ्रमण करते समय शिव-पार्वती भी वहां ठहर गए। पार्वतीजी ने कहा- हे नाथ! आओ, आज इसी स्थान पर चौसर-पांसे खेलें। खेल प्रारंभ हुआ। उस समय पुजारी जी पूजा करने आए पार्वतीजी ने पूछा- पुजारी जी, बताइए जीत किसकी होगी?
पुजारी बोला- इस खेल में महादेव जी के समान कोई दूसरा पारंगत नहीं हो सकता इसलिए महादेव जी ही यह बाजी जीतेंगे। परंतु हुआ उल्टा, जीत पार्वतीजी की हुई। अत: पार्वतीजी ने पुजारी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया कि तूने मिथ्या भाषण किया है।
शिव-पार्वतीजी दोनों वापस चले गए। कुछ समय पश्चात अप्सराएं पूजा करने आई। अप्सराओं ने पुजारी के उसके कोढ़ी होने का कारण पूछा । पुजारी ने सब बातें बता दीं। अप्सराएं कहने लगीं- पुजारीजी, आप १६ सोमवार का व्रत करें तो शिवजी प्रसन्न होकर आपका संकट दूर करेंगे। अप्सराओं ने व्रत करने और व्रत के उद्यापन करने की संपूर्ण विधि बता दी । पुजारी ने विधि पूर्वक श्रद्धा भाव से व्रत प्रारंभ किया और अंत में व्रत का उद्यापन भी किया। व्रत के प्रभाव से पुजारीजी रोगमुक्त हो गए।
कुछ दिनों बाद शंकर-पार्वत जी पुन: उस मंदिर में आए तो पुजारी जी को रोगमुक्त देखकर पार्वतीजी ने पूछा- मेरे दिए हुए श्राप से मुक्ति पाने का तुमने कौन सा उपाय किया। पुजारीजी ने कहा- हे माता ! अप्सराओं द्वारा बताए गए १६ सोमवार के व्रत करने से मेरा यह कष्ट दूर हुआ है।
पार्वतीजी ने भी १६ सोमवार का व्रत किया जिससे उनसे रूठे हुए कार्तिकेय जी भी अपनी माता से प्रसन्न होकर आज्ञाकारी हुए| कार्तिकेय जी ने पूछा - हे माता! क्या कारण है कि मेरा मन सदा आपके चरणों में लगा रहता है। पार्वतीजी ने कार्तिकेय को १६ सोमवार के व्रत का माहात्म्य तथा विधि बताई, तब कार्तिकेयजी ने भी इस व्रत को किया तो उनका बिछड़ा हुआ मित्र मिल गया। अब मित्र ने भी इस व्रत को अपने विवाह होने की इच्छा से किया। फलत: वह विदेश गया। वहां के राजा की कन्या का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया था कि हथिनी जिस व्यक्ति के गले में वरमाला डाल देगी, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह करूंगा। यह ब्राह्मण मित्र भी स्वयंवर देखने की इच्छा से वहां एक ओर जाकर बैठ गया। हथिनी ने इसी ब्राह्मण मित्र को माला पहनाई तो राजा ने बड़ी धूमधाम से अपनी राजकुमारी का विवाह उसके साथ कर दिया। एक दिन राजकन्या ने पूछा - हे नाथ! आपने कौन-सा पृण्य किया जिससे हथिनी ने आपके गले में वरमाला पहनाई ब्राह्मण पति ने कहा - मैंने कार्तिकेयजी द्वारा बताए अनुसार १६ सोमवार का व्रत पूर्ण विधि-विधान सहित श्रद्धा-भक्ति से किया जिसके फल के कारण मुझे तुम्हारे जैसी सौभाग्यशाली पत्नी मिली। अब तो राजकन्या ने भी सत्य-पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया और सर्वगुण संपन्न पुत्र प्राप्त किया। बड़े होकर पुत्र ने भी राज्य प्राप्ति की कामना से १६ सोमवार का व्रत किया। राजा के देवलोक होने पर इसी ब्राह्मण कुमार को राजगद्दी मिली, फिर भी वह इस व्रत को करता रहा। एक दिन उसने अपनी पत्नी से पूजा सामग्री शिवालय ले चलने को कहा, परंतु उसने पूजा सामग्री अपनी दासियों द्वारा भिजवा दी। तो उसने अपनी पत्नी को महल से निकाल दिया। तब वह अपने भाग्य को कोसती हुई रानी चलते-चलते एक आश्रम में पहुंची । गुसांई जी उसे देखते ही समझ गए कि यह उच्च घराने की अबला विपत्ति की मारी है वे उसे धैर्य बंधाते हुए बोले- बेटी, किस देव के अपराध से ऐसा होता है? रानी ने बताया कि मैंने अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन किया और शिवालय में पूजन के लिए नहीं गई, इससे मुझे घोर कष्ट उठाने पड़ रहे हैं।
गुसांई जी ने शिवजी से उसके कुशलक्षेम के लिए प्रार्थना की और कहा- बेटी, तुम १६ सोमवार का व्रत विधि के अनुसार करो, तब रानी ने विधि-पूर्वक व्रत पूर्ण किया। व्रत के प्रभाव से राजा को रानी की याद आई और दूतों को उसकी खोज में भेजा। आश्रम में रानी को देख दूतों ने राजा को बताया| तब राजा ने वहां जाकर गुसांई जी से कहा- महाराज! यह मेरी पत्नी है। मैंने इसका परित्याग कर दिया था। कृपया इसे मेरे साथ जाने की आज्ञा दें। शिवजी की कृपा से प्रतिवर्ष १६ सोमवार का व्रत करते हुए वे आनंद से रहने लगे और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुए।
॥ सोम प्रदोष व्रत कथा - ३॥
शौनकादि ऋषि बोले - हे पूज्यवर महामते, आपने यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओं के लिए बताया है, अब कृपा कर यह बताने का कष्ट करें कि यह व्रत किसने किया व क्या फल पाया?
सूत जी बोले - एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था, इसलिए भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके पिता को बन्दी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।
एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुनः प्राप्तकर आनन्द पूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दुसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं।
॥ आरती महादेव जी की ॥
* जय शिव ओंकारा, हर शिव ओंकारा । ब्रम्हा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥ १॥
* एकानन, चतुरानन, पंचांनन राजे । हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥२॥
* दोय भुज चार चतुर्भज, दस भुज अति सोहें। तीनों रुप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥३॥
* अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड्माला धारी । चंदन, मृदमग चन्दा, भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥४॥
* श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें । सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥५॥
* कर मध्य कमण्डल, चक्र त्रिशूल धरता । जगकर्ता दुखहर्ता, जग पालन कर्ता ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥ ६॥
* ब्रम्हा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका । प्रणवाक्षर दौ मध्यें, ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥७॥
* काशीमें विश्वनाथ विराजत, नन्दो ब्रम्हचारी । नित उठी भोग लगावत, सेवत नर नारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥८॥
* त्रिगुण स्वामिजी की आरती, जो कोई नर गावें । कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावें॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥९॥
* जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा । ब्रम्हा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... ॥१०॥
