महाभारत 20 मिनट में
देवव्रत
यह द्वापर युग के अंत की बात है। राजा शांतनु का राज था। एक बार वे शिकार खेलते हुए गंगा नदी के किनारे जा पहुंचे, जहां उन्हें एक अत्यंत रूपवती युवती दिखाई दी और वह उन्हें भा गई। राजा शांतनु ने उस युवती से विवाह कर लिया। लेकिन युवती ने विवाह बंधन में बंधने से पहले दो शर्त रखी एक तो यह कि शांतनु उनके किसी भी कार्य में कभी बाधा नहीं डालेंगे और दूसरी यह कि वह कौन है यह जानने की कभी कोशिश नहीं करेंगे। इस प्रकार वह युवती रानी बन गई और गर्भवती हुई। लेकिन रानी ने अपनी पहली ही संतान को नदी में विसर्जित कर दिया। राजा शांतनु यह नहीं पूछ पाए क्योंकि वह अपनी प्रतिज्ञा में बंधे थे। इस प्रकार रानी के सात बच्चे पैदा हुए और सभी को उन्होंने नदी में बहा दिया। आठवें बच्चे के पैदा होते ही शांतनु से रहा नहीं गया और उन्होंने रानी से इसका कारण पूछ ही लिया और वचन भंग कर दिया। रानी ने आठवें बच्चे को तो नदी में नहीं बहाया लेकिन उन्होंने बच्चों को नदी में बहाने का रहस्य खोल दिया। रानी ने जवाब दिया।
“हे राजन सच्चाई यह है कि मैं गंगा हूं और महर्षि वशिष्ठ की आदेशानुसार मैंने मानव शरीर धारण किया है। यह आठ शिशु कोई और नहीं आठ वसु हैं और महर्षि वशिष्ठ की कामधेनु गाय को चुराने के कारण इन्हें मानव योनि में जन्म लेने का शाप मिला था और इन सभी का शाप पूरा हुआ” इसके बाद आठवें वसु को भविष्य में दोबारा लौटाने की बात कहकर गंगा उसे भी अपने साथ ले गई। धीरे-धीरे समय बीता और एक दिन राजा शांतनु गंगा तट पर खड़े थे तब उन्हें वहां एक युवक दिखा जो नदी के तट पर धनुष ताने खड़ा था। तभी गंगा दोबारा प्रकट हुई और राजा शांतनु को बताया कि यही उनका आठवां पुत्र है। राजा शांतनु ने उस युवक को अपने साथ ले लिया और उसका नाम देवव्रत रखा।
इसके बाद राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया और सत्यवती से दो पुत्र हुए। सत्यवती को अपने पुत्रों के भविष्य की चिंता थी तो देवव्रत ने एक प्रतिज्ञा ली कि सत्यवती से पैदा हुई संतानों को ही राज्य शासन दिया जाएगा और वे आजीवन अविवाहित रहेंगे। इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा।
दोनों पुत्रों का नाम चित्रांगद और विचित्रवीर्य था। गंधर्व राजा से युद्ध करते हुए चित्रांगद मारा गया और विचित्रवीर्य के व्यस्क न होने के कारण भीष्म को राजपाट का संचालन करना पड़ा। तब भीष्म ने सुना कि काशी नरेश अपनी तीनों पुत्रियों का स्वयंवर आयोजित कर रहे हैं। तब भीष्म उनकी तीनों पुत्रियों अंबा, अंबिका, अंबालिका को उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ उठाकर हस्तिनापुर ले गए ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य के साथ करा सकें। उस समय अंबा के कहने पर भीष्म ने उसे छोड़ दिया क्योंकि अंबा सोम देश के राजा शाल्व से प्रेम करती थी। परंतु अंबा जब शाल्व के पास पहुंची तो शाल्व ने उसे ठुकरा दिया। अब अंबा दोबारा भीष्म के पास आकर बोली कि अब में तुमसे विवाह करूंगी। लेकिन भीष्म ब्रह्मचारी थे, इस प्रकार अंबा न इधर की रही और न उधर की और उसने भीष्म से बदला लेने की ठान ली। वह भगवान शंकर की घोर तपस्या में लीन हो गई और भीष्म के नाश का वर मांगा। तब भगवान शंकर ने कहा कि वह अपने अगले जन्म में भीष्म से बदला लेगी। अंबा ने स्वाभाविक मौत की प्रतीक्षा न कर स्वयं अपने हाथों से चिता बनाकर आग खुद को अग्नि के हवाले कर दिया और राजा द्रुपद की पत्नी के गर्भ से नया जन्म ग्रहण किया। किंतु अगले जन्म में भी वह स्त्री के रूप में पैदा हुई, पर वह पुरुष रूप पाना चाहती थी इसलिए उसने दोबारा घोर तपस्या की और बाद में उसे पुरुष रूप मिला जो शिखंडी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कुटुम्ब
विचित्रवीर्य नि:संतान ही बीमारी के कारण मर गए और उनकी पत्नियां अंबिका और अंबालिका से कोई पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। इससे सत्यवती बहुत दुखी थी क्योंकि उसके दोनों पुत्र निसंतान मर गए थे। तब सत्यवती ने भीष्म को अपनी एक अन्य संतान के बारे में बताया जो ऋषि पराशर से उन्हें प्राप्त हुई थी और जिसका नाम व्यास था। व्यास ने अंबिका और अंबालिका से विवाह किया और उन्हें दो पुत्र हुए। उसमें से एक अंधा और दूसरा पीला था इसके अलावा व्यास से एक और पुत्र हुआ जो दासी पुत्र था। क्योंकि रात के समय अंबिका के स्थान पर कमरे में उसके कपड़े पहन कर दासी चली गई थी।
इस प्रकार व्यास के तीन पुत्र हुए। जो पुत्र अंधा था उसका नाम धृतराष्ट्र पड़ा, जो अंबालिका से उत्पन्न पीले वर्ण का पुत्र था उसका नाम पांडू था और दासी का विकारहीन पुत्र विदुर कहलाया जो सर्वगुण संपन्न था। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ और क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे थे तो राज्य अधिकार उन्होंने अपने छोटे भाई पांडू को सौंप दिया। पांडु का दो कन्याओं से विवाह हुआ पहली माद्री और दूसरी कुंती। कुंती राजा शूरसेन की पुत्री थी जो श्रीकृष्ण के पितामह थे। जबकि तीसरे राजकुमार विदुर का विवाह राजा देवक की कन्या पारशवी से हुआ।
कुंती को तीन पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई इसमें युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन थे। जबकि माद्री को दो पुत्र रत्न मिले जो नकुल और सहदेव थे और यह पांचों भाई पांडव कहलाए। इससे पहले विवाह से पूर्व ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक विशेष मंत्र सिखाया और कहा कि जिस देवता का स्मरण करके वह यह मंत्र जप करेगी तो उससे तेजस्वी व तपस्वी पुत्र रत्न का फल मिलेगा। कुंती ने मंत्र का जाप कर सूर्य को याद किया और सूर्य ने कुंती को पुत्र फल दिया जो जन्म से ही कुंडल व कवच धारण कर पैदा हुआ। समाज के भय से कुंती ने शिशु को जन्म लेते ही नदी में बहा दिया, जो नदी में नहा रहे एक सारथी को मिला जो नि:संतान था। उस शिशु का नाम उसने वसुसेन रखा जो बड़ा होकर कर्ण के नाम से विख्यात हुआ। उधर धृतराष्ट्र और गांधारी को पूरे सौ पुत्र प्राप्त हुए और ये सौ पुत्र कौरव कहलाए। इनका सबसे बड़ा पुत्र का नाम दुर्योधन था।
पांडव और कौरव जैसे राजकुमार पाकर हस्तिनापुर धन्य था। समय बीतता गया और कुछ समय पश्चात पांडु का आकस्मिक निधन हो गया और तब धृतराष्ट्र ने गद्दी संभाली। वहीं दुर्योधन के जन्म के समय अपशकुन के लक्षणों के कारण सत्यवती अपनी बहू अंबिका और अंबालिका को साथ लेकर वन गमन कर गई।
शिक्षा
धृतराष्ट्र ने अपने सौ पुत्रों के साथ पांच भतीजे पांडु पुत्र पांडवों को समान रूप से स्नेह दिया। ये सभी राजकुमार बिना भेदभाव के साथ रहने लगे, सभी को उच्च शिक्षा दी गई। हस्तिनापुर की राजगद्दी पर तो धृतराष्ट्र बैठे थे लेकिन भीष्म ही सारा शासन एवं कार्य संभालते थे। वे राजकुमारों को हर तरह से दक्ष करना चाहते थे इसलिए उन्होंने राजकुमारों के लिए एक गुरु की नियुक्ति की जो द्रोणाचार्य थे।
कौरव और पांडवों ने गुरु से युद्ध कला एवं शस्त्र चालन की विद्या एक साथ सीखी। लेकिन दुर्योधन और उसके भाइयों ने इन शिक्षाओं में कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई। हालांकि वे वीर थे पर पांडवों के स्तर के नहीं। हर जगह पर पांडवों का ही गुणगान अधिक किया जाता था और अधिक वीर बताया जाता था। जिसकी वजह से दुर्योधन पांडवों से अत्यंत ईर्ष्या करता था।
कई वर्षों पश्चात जब राजकुमारों की शिक्षा समाप्त हो गई तब एक समारोह आयोजित किया गया। जहां सभी राजकुमारों ने अपना प्रदर्शन करना शुरू किया। इस संपूर्ण प्रदर्शन में अर्जुन ने युद्ध कला का अद्वितीय प्रदर्शन किया जिससे पूरा समारोह अर्जुन की वाहवाही से गूंज उठा। तब एक युवक ने अर्जुन को चुनौती देने का साहस किया। यह सूर्यपुत्र कर्ण था जो यह आयोजन देखने आया था। पहले तो अर्जुन ने मना किया क्योंकि कर्ण एक राजवंश से नहीं था लेकिन कर्ण के अधिक ललकारने पर अर्जुन को भी गुस्सा आ गया। दोनों के बीच युद्ध होने ही वाला था लेकिन तभी संध्या हो गई और युद्ध नहीं लड़ा जा सका। उस समय दुर्योधन ने कर्ण को अपना परम मित्र घोषित कर अंग देश का राजा बना दिया और उसे अपने साथ महल में ले गया।
युवावस्था में द्रोणाचार्य के मित्र द्रुपद थे जो कालांतर में पांचाल देश के राजा बने। उस वक्त द्रोणाचार्य के दिन संकट से गुजर रहे थे। तब द्रोणाचार्य अपने मित्र द्रुपद से मदद मांगने गए जहां भरे दरबार में द्रुपद ने द्रोणाचार्य का अपमान किया। तब द्रोणाचार्य ने वचन लिया कि वह द्रुपद से एक दिन प्रतिशोध अवश्य लेंगे। एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने सभी राजकुमारों को बुलाया और पांचाल नरेश द्रुपद से अपना बदला लेने के लिए कहा। तब कौरव एवं पांडवों ने मिलकर द्रुपद पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर दिया। उस वक्त गुरु द्रोणाचार्य के मन को शांति मिली और उन्होंने द्रुपद का आधा राज्य लेकर स्वयं भी आधे पांचाल प्रदेश के राजा बन गए। द्रुपद को अत्यंत लज्जित होना पड़ा और वे अपनी इस बेइज्जती को चुपचाप सहते रहे और मन ही मन ठान ली कि वे द्रोणाचार्य से इस बेइज्जती का बदला अवश्य लेंगे।
पांडवों की वीरता तथा योग्यता धृतराष्ट्र से विमुख नहीं थी और एक दिन उन्होंने युधिष्ठिर जो कौरव-पांडवों में सबसे बड़े थे को राजपाट सौंप देने की घोषणा की। तब युधिष्ठिर ने सभी के साथ मिलकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया और जन-जन से अपार लोकप्रियता प्राप्त की और प्रजाजनों की भलाई के अनेक नए नए कदम उठाए। लेकिन धीरे-धीरे धृतराष्ट्र को अपनी इस घोषणा से अप्रसन्नता होने लगी क्योंकि हर जगह पांडवों का ही गुणगान हो रहा था और उनके बेटों का नहीं। वहीं दुर्योधन भी अपने पिता से नाराज था क्योंकि वह कहता था कि धृतराष्ट्र पिता होने का फर्ज भी नहीं निभा रहे हैं। तब एक दिन दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को अपनी एक योजना बताई और कहा कि पांडवों को कुछ दिनों के लिए आराम करने के लिए हस्तिनापुर नगर से बाहर भेज दिया जाए और वही कहीं उनके रहने की अच्छी व्यवस्था की जाए। जब वे चले जाएंगे तो पीछे से वे अपनी राजधानी को मुट्ठी में ले लेंगे। धृतराष्ट्र थोड़ा हिचकिचाये लेकिन दुर्योधन के अधिक दबाव बनाने पर धृतराष्ट्र ने हामी भर दी। जब यह बात युधिष्ठिर को पता चली तो उसने आज्ञा का पालन किया और वे अपनी मां और चारों भाइयों समेत वरणावत की ओर चले गए। यह बात भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर आदि सभी बुजुर्गों को अच्छी नहीं लगी परंतु राजा के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते थे। विदुर जानते थे कि यह कोई कूटनीतिक योजना हो सकती है इसलिए उन्होंने युधिष्ठिर को चेताया भी।
वरणावत
दुर्योधन ने पुरोचन जो भवन निर्माण कला में महान था और उसने यथाशीघ्र पांडवों के लिए एक भव्य भवन का निर्माण किया जो बहुत ही खूबसूरत था एवं सारी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण था। भवन इतना अच्छा था कि पांडवों ने यहां रहने का निर्णय कर लिया लेकिन भवन के अंदर कदम रखते ही युधिष्ठिर को उसकी दीवारों से लाख, तेल आदि की दुर्गंध आने लगी। युधिष्ठिर को विदुर की दी हुई चेतावनी याद आई और वह समझ गया कि उन्हें यहां जलाकर मारने की पूरी तैयारी की गई है। दुर्योधन ने पुरोचन को आदेश दिया गया कि माह के कृष्ण पक्ष को रात में जब सभी लोग गहरी नींद में सोए होंगे वह इस महल को आग लगा देगा। तत्पश्चात विदुर ने एक व्यक्ति को पांडवों की सहायता के लिए भेजा जो सुरंग खोदने में माहिर था। उसने एक सुरंग खोदी जो महल के अंदर से बाहर निकलती थी। युधिष्ठिर दुर्योधन को इस चाल को जानता था और माह के कृष्ण पक्ष की रात को कुंती ने वारणावत निवासियों को भवन में खाने की दावत दी। लोग खुशी-खुशी भवन पहुंचे और सभी ने मिलजुल कर खाया पिया। आयोजन समाप्त होने के बाद सभी चले गए और आधी रात को एक-एक कर चारों भाई कुंती सहित उस गुप्त सुरंग से बाहर निकल गए जबकि भीम महल में ही रुक गया क्योंकि पांडवों ने महल को आग लगाने की योजना बनाई थी।
पुरोचन अपने कमरे में गहरी नींद में सोया हुआ था। भीम ने उस भवन में आग लगा दी और स्वयं भी सुरंग के मार्ग से बाहर निकल आया। थोड़ी ही देर में भवन आग की लपटों से में समा गया और देखते ही देखते पूरा जल गया जिसमें पुरोचन मारा गया। सभी को यह लगा कि कुंती एवं उनके पांचों पुत्र भी जलकर मर गए हैं। यह सूचना जब दुर्योधन को मिली तो वह खुशी के मारे फूला नहीं समाया। उसने सोचा कि उसका काम हो गया अब वह पूरे हस्तिनापुर पर राज करेगा एवं उसकी वाहवाही होगी।
स्वयंवर
इधर पांडव वहां से निकलते हुए जंगल में पहुंच गए जहां भीम का हिडिंबा नामक एक राक्षसी से सामना हुआ। हिडिंबा को भीम की कद-काठी बहुत पसंद आई और वह उस पर मोहित हो गई और प्रेम करने लगी। माता कुंती एवं युधिष्ठिर के कहने पर भीम ने हिडिंबा से विवाह किया जिससे कालांतर में घटोत्कच नामक वीर पुत्र पैदा हुआ। इसके बाद वन में भटकते भटकते पांडव एकचक्र नगरी पहुंचे जहां उन्होंने ब्राह्मणों का वेश धारण किया जिससे उन्हें कोई पहचान न सके। वहां भीम ने बकासुर नामक एक राक्षस का वध किया और नगर के लोगों को उसके कहर से बचाया। इसके बाद एक तपस्वी ने पांडवों को बताया कि पांचाल देश का राजा द्रुपद अपनी कन्या द्रौपदी का स्वयंवर कर रहा है और पांडवों को भी यहां भाग लेना चाहिए आखिर वे भी तो राजकुमार ही है। तब पांडव पांचाल देश की ओर चल पड़े।
समारोह स्थल के बीचों बीच एक मंच पर भारी धनुष पड़ा था और एक बड़ी कढ़ाई में तेल भरा हुआ था और पास में यंत्र पर एक नकली मछली तेजी से घूमती हुई लटक रही थी जिस पर धनुष से निशाना साधना था। द्रौपदी के वरण की इच्छा से दुर्योधन भी अपने भाइयों और कर्ण के साथ आया था। शोभा निहारने श्रीकृष्ण भी द्वारिका से पधारे थे। वहीं पांडव ब्राह्मण वेश में दर्शक दीर्घा में बैठे थे। समारोह आरंभ होने पर अनेकों राजकुमार धनुष को उठाने में लग गए। लक्ष्य को भेदना तो दूर वे धनुष तक को ना उठा सके। दुर्योधन के साथ-साथ अनेक राजा व राजकुमार असफल होकर सिर झुकाए बैठे थे। तभी कर्ण अपनी जगह से उठा और धनुष की ओर बढ़ा और बड़ी ही आसानी से उसने धनुष को उठा लिया और तेल में लक्ष्य की परछाई की ओर नजरें गड़ा कर धनुष की प्रत्यंचा खींची। लेकिन तभी सभा में द्रौपदी का स्वर गूंज पड़ा। “मैं सारथी पुत्र का वरण नहीं कर सकती”
यह सुनते ही उसने धनुष अपनी जगह रख दिया और सिर झुका कर वापस लौट आया। इस प्रकार समस्त राजकुमार व नरेश असफल होकर बैठ गए। तभी अर्जुन अपने स्थान से उठा जो ब्राह्मण के वेश में था। ब्राह्मण को धनुष उठाता देख सभा में कोलाहल मच गया। सभी सोच रहे थे जो कार्य क्षत्रियों से न हो सका वह ब्राह्मण कैसे कर सकेगा। परंतु वहां बैठे श्रीकृष्ण ने पहली ही नजर में पांडवों को पहचान लिया था और अर्जुन तो श्रेष्ठ धनुर्धारी था ही। उसने बड़ी ही आसानी से धनुष को उठा लिया और फिर एक-एक करके पांच तीर मछली पर निशाना लगाते हुए उसे भेद दिये।
लोग अर्जुन की वीरता की प्रशंसा करने लगे। परंतु क्षत्रिय राजकुमारों को यह बात पसंद नहीं आई क्योंकि स्वयंवर में सिर्फ क्षत्रिय ही भाग ले सकते थे और एक ब्राह्मण राजकुमारी का पति नहीं बन सकता था। किंतु द्रुपद ने किसी की नहीं सुनी, द्रौपदी तो पहले से ही इस तेजस्वी ब्राह्मण पर मुग्ध थी। इस प्रकार अर्जुन अपने चारों भाईयों के साथ द्रौपदी को अपनी नववधू बनाकर घर लौट आया।
कुंती व्याकुलता से पुत्रों की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी भीम ने मां को चौंकाने के लिए बाहर से ही पुकार कर बोला, “मां जल्दी आओ देखो आज हम कितनी अच्छी चीज लेकर आए हैं” कुंती ने बिना यह जाने ही वह क्या है, बोला, “बेटा जो कुछ भी मिला है जिस प्रकार तुम हमेशा से बराबर बांटते आए हो, मेरी आज्ञानुसार आज उसे भी पांचों भाई बराबर बांट लो।“
पांडव बचपन से ही अपनी मां के आज्ञाकारी थे और अपने मां की किसी भी आज्ञा को अपना वचन मानते थे। जैसे ही मां कुंती ने देखा कि उनके साथ द्रौपदी है तो उसने इस आज्ञा एवं वचन को तोड़ने के लिए उन्हें समझाया। तब अर्जुन कहा, “नहीं मां, हम तुम्हारे वचन का अनादर नहीं कर सकते अब द्रौपदी हम पांचों भाइयों ही की पत्नी बनेगी!” हालांकि युधिष्ठिर समेत चारों भाई नहीं चाहते थे कि वे द्रौपदी का वरण करें। किंतु अर्जुन के अधिक जिद करने एवं वचन निभाने के लिए सभी को द्रौपदी का वर्णन करना ही पड़ा और द्रौपदी को मजबूरन पांचों की पत्नी बनना पड़ा।
तभी वहां श्रीकृष्ण एवं दुप्रद अपने बेटे धृष्टद्युम्न के साथ आए। जैसे ही उन्हें यह पता चला कि ये पांडव है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस वक्त द्रुपद ने भी युधिष्ठिर को भविष्य में कौरवों के खिलाफ हमेशा साथ देने का वचन दिया। परंतु जब द्रुपद को यह पता चला कि वचन के कारण अर्जुन ही नहीं बल्कि पांडवों को द्रौपदी से विवाह करना है तो उन्होंने इस फैसले पर फिर विचार करने को कहा। लेकिन तभी वहां महर्षि व्यास पहुंचे और उन्होंने मुस्कुराकर कहा की द्रौपदी के बारे में चिंतित ना हो। क्योंकि यही होनी थी और इसे कोई नहीं रोक सकता। द्रौपदी के भाग्य में पांच व्यक्तियों का ही सुख लिखा है जो कि पूर्व जन्म में इसे अपने अच्छे कर्मो की वजह से मिला है।
इधर जब दुर्योधन को यह पता चला कि पांडव जीवित हैं तो इससे दुर्योधन को बड़ा आघात हुआ। वह किसी भी प्रकार से पांडवों को जीवित नहीं देखना चाहता था क्योंकि वह हस्तिनापुर पर अपना पूर्ण अधिकार चाहता था। आखिरकार विदुर, भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य द्वारा धृतराष्ट्र को समझाया गया कि आखिर पांडव पिछले एक वर्ष से हस्तिनापुर से बाहर रह रहे हैं और अब तो उनके साथ द्रौपदी भी है इसलिए अब उन्हें से सम्मान हस्तिनापुर लाया जाए और भविष्य में कौरव पांडवों को शांति एवं सद्भावना के साथ रहने के लिए समझाया जाए।
आखिरकार विदुर पांचाल नरेश द्रुपद के पास पहुंचे जहां पर पांडव एवं द्रौपदी थे और उन्हें अपने साथ लेकर हस्तिनापुर ले आए। हस्तिनापुर में आते ही लोगों ने पांडवों का भव्य स्वागत किया। महल में पहुंचते ही सभी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। कुछ समय शांति से बीता, तब एक दिन धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाकर कहा, “अब वक्त आ गया है कि मैं जीते जी अपना कर्तव्य निभाऊं। तुम लोगों का इस राज्य पर बराबर अधिकार है, तो मैं इस राज्य को दो भागों में विभक्त कर रहा हूं और खांडवप्रस्थ तुम लोगों को देता हूं जबकि कौरव हस्तिनापुर में ही रहेंगे।“ युधिष्ठिर ने यह फैसला स्वीकार कर लिया और इस प्रकार पांडवों के पास खांडवप्रस्थ आ गया।
इंद्रप्रस्थ
युधिष्ठिर अपने भाइयों, माता और पत्नी के साथ खांडवप्रस्थ आ गए। यह इलाका बसने के एकदम अयोग्य था। चारों और बंजर, ऊबड़-खाबड़ भूमि और जंगल था। दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी फिर भी पांडवों को संतोष था कि आखिर धृतराष्ट्र ने उनके बारे में इतना तो सोचा और उन्हें इतनी जगह तो दी। पांडव उद्यमी थे तो उन्होंने खांडवप्रस्थ को ही रहने योग्य बना दिया। उन्होंने श्रीकृष्ण के सहयोग से द्वारिका के अच्छे अच्छे कारीगरों को खांडवप्रस्थ बुलाया और फिर से नगर निर्माण का आरंभ किया। देखते ही देखते खांडवप्रस्थ जैसे निर्जन क्षेत्र की कायापलट हो गई। नगर की शोभा बस देखते ही बनती थी। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यह कभी बंजर भूमि थी। श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से युधिष्ठिर ने नए राज्य का कार्यभार संभाला और इस नए राज्य का नाम खांडवप्रस्थ से बदलकर इंद्रप्रस्थ रखा गया।
पांडव इंद्रप्रस्थ में रहने लगे लेकिन एक दिन नारद मुनि वहां पधारे और उन्होंने युधिष्ठिर को एक सलाह दी। उन्होंने कहा, “मुनिवर यदि आप पांचों द्रौपदी के साथ एक साथ रहोगे तो आपमें आपसी मनमुटाव होने का डर हो सकता है। क्योंकि भूतकाल में भी इस प्रकार कई बार एक नारी को लेकर आपस में भाई-भाइयों में झगड़ा हुआ है और वे आपस में लड़ लड़कर मिट गए। तो ऐसा करो द्रौपदी को एक-एक वर्ष बारी-बारी से पांचों भाइयों में बांटो। ऐसे में कोई दूसरा भाई द्रौपदी को देखेगा भी नहीं। अगर इस नियम को किसी ने तोड़ा तो उसे बारह वर्ष के लिए राज्य से निष्कासित होना पडेगा।“
यह सलाह पांडवों ने मान ली और यह नियम लागू हो गया। पांचों भाई बड़े संयम और नियम से रहने लगे और द्रौपदी के कारण कभी उनमें कलह नहीं हुई और ना ही किसी ने यह नियम तोड़ा। परंतु एक बार गलती से अर्जुन द्रौपदी और युधिष्ठिर के कमरे में बिना आज्ञा के प्रवेश कर गया। हालांकि इस बात का पता युधिष्ठिर को नहीं था। किंतु अर्जुन वचनबद्ध था तो उसने स्वयं अपने अपराध को युधिष्ठिर के सामने स्वीकारा और बारह वर्षो के लिए वन की ओर चला गया।
इस प्रकार अर्जुन इंद्रप्रस्थ से निकलकर बारह वर्षो तक बाहर रहा। इन बारह वर्षों के बीच अर्जुन ने नागलोक की कन्या उलूपी से विवाह किया। इसके बाद उसने मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा से विवाह किया जिससे अर्जुन को वभ्रुवाहन नामक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसे भविष्य में मणिपुर का भावी राजा घोषित किया गया। इसके बाद अर्जुन ने एक तीसरा विवाह सुभद्रा से किया जो श्रीकृष्ण की बहन थी। सुभद्रा से अर्जुन को अभिमन्यु नामक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस प्रकार अर्जुन के बारह वर्ष समाप्त हुए। उधर द्रौपदी भी पांच पुत्रों की मां बनी। युधिष्ठिर से उसे प्रातबिंद्य, भीम से श्रुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक तथा सहदेव से श्रुतासन नामक पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई।
इसके बाद एक बार अर्जुन ने अग्नि देव को अपनी भूख मिटाने के लिए इंद्रप्रस्थ के जंगलों को अग्नि के हवाले करने दिया, जिससे प्रसन्न होकर अग्निदेव ने अर्जुन को सोमराज का गांडीव नामक धनुष दिया। तब उस जंगल में मय नामक राक्षस जो बहुत ही अच्छा वास्तुकार था, को अर्जुन ने जलने से बचा लिया। तब उसने इंद्रप्रस्थ में एक ऐसा भवन बनाया जिसकी कला देखकर पांडवों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस भवन की सुंदरता एवं भव्यता की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। इंद्रप्रस्थ तो पहले से ही बहुत ही भव्य नगर था और इस भवन के निर्माण के बाद इसकी सुंदरता पर चार चांद लग गए।
तब नारद के कहने पर युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया जहां विश्व के समस्त नरेश व राजकुमारों को आमंत्रित किया गया। इस यज्ञ में कौरव भी पधारे। इंद्रप्रस्थ का वैभव देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। दुर्योधन भवन के सभागार में पहुंचा। इसकी कारीगरी का जवाब नहीं था। तभी उसे सभागार में एक तालाब दिखाई दिया जहां एक कमल का फूल खिला हुआ था। उसने जैसे ही कमल के फूल को तोड़ना चाहा जो फर्श पर बनाया गया था। इसे देखकर सभागार में चारों ओर हंसी की लहर गूंज गई और दुर्योधन की मूर्खता का सभी ने मजाक उड़ाया। तभी दुर्योधन क्रोध से आगे बढ़ा और सामने एक दरवाजा देखकर वहां से आगे जाने लगा, किंतु जिसे वो दरवाजा समझ रहा था वह एक दीवार पर बनाया गया दरवाजे का चित्र था, जो वास्तविक दरवाजे की भांति दिखाई दे रहा था। दुर्योधन इस दीवार से टकरा गया तब उसकी और अधिक बेइज्जती हुई। तीसरी बार तो सबसे बड़ी दुर्गति तब हुई जब उसे एक भव्य सरोवर दिखाई दिया, उसने सोचा यह फर्श पर बना कला का नमूना होगा इसलिए वह निश्चिंत होकर आगे बढ़ा। लेकिन इस बार वह सरोवर असली निकला और वह उसमें जा गिरा।
इस अपमान से दुर्योधन एक पल भी इंद्रप्रस्थ नहीं रुका और आग बबूला होकर वहां से लौट आया वह अपमान की आग में जल रहा था। इस वक्त उसके साथ उसका मामा शकुनि भी था तब उसने शकुनि मामा को किसी भी प्रकार पांडवों को नष्ट करने की बात कही।
धूतक्रीड़ा
युधिष्ठिर को जुआ खेलने का बड़ा शौक था। बस शकुनि ने उसके इसी शौक का फायदा उठाया और शकुनि के कहने पर धृतराष्ट्र ने पांडवों को आमंत्रण भेजा साथ ही हस्तिनापुर में इंद्रप्रस्थ जैसा ही एक भवन निर्माण कराया जहां जुए का खेल होना था। उस भवन को देखने के लिए पूरे विश्व के अनेक राजाओं एवं राजकुमारों को आमंत्रित किया गया। पांडव अब तक यह नहीं जानते थे कि यहां आकर उन्हे जुआ खेलना होगा। जब सभी सभागार में उपस्थित थे तब शकुनि ने युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए आमंत्रित किया। हालांकि युधिष्ठिर उस समय नहीं खेलना चाहता था किंतु शकुनि के बड़े ही प्रेम भाव से आग्रह करने पर वह मना ना कर सका।
खेल शुरू हुआ, युधिष्ठिर ने शुरू में जो दांव लगाए शकुनि ने चुटकियों में उन्हें जीतकर अपना अधिकार कर लिया। युधिष्ठिर हर हारी हुई बाजी के साथ अपना विवेक खोता जा रहा था और शकुनि बड़ी ही चालाकी से हर बाजी जीतता जा रहा था। अंत में युधिष्ठिर अपना सब कुछ हार गया। उसने राज्य की भूमि, सैनिक, शस्त्र, सेवक सभी गवां दिये। यह बात किसी से बर्दाश्त नहीं हुई और तब विदुर ने धृतराष्ट्र को इस खेल को रोकने के लिए आदेश देने को कहा। धृतराष्ट्र पुत्र मोह में कुछ ना कर सके। अंत में जब कुछ नहीं बचा तो युधिष्ठिर ने स्वयं समेत चारों भाइयों को भी दांव पर लगा दिया और हार बैठा। अंत में युधिष्ठिर बोला, अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है। तब शकुनि बोला, अभी द्रौपदी बाकी है।
यह सुनकर सभी को गुस्सा आया, पांडवों ने भी इसका विरोध किया। पर ना जाने क्यों इस दिन युधिष्ठिर की मति मारी गई थी और उसने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया। अगले ही पल द्रौपदी पर भी कौरवों का अधिकार हो गया। दुर्योधन ने शकुनि को अपनी बाहों में भर लिया और अपने भाई दुशासन को द्रौपदी को अपने कक्ष से लाने को भेजा। दुशासन द्रौपदी के कक्ष में गया और उसे अपने साथ चलने को कहा। जब द्रौपदी ने मना किया तो दुशासन उसके बाल खींचकर उसे घसीटता हुआ सभागार में लेकर आया। यह देख कर सभी की कराह निकल गई किंतु कोई कुछ ना कर सका। सभागार में बैठे लोग दुशासन के इस कृत्य से बड़े मर्माहत हुए। द्रौपदी को दासी के रूप में देखकर कौरव बहुत खुश थे।
धृतराष्ट्र को पितामह भीष्म ने बहुत समझाया किंतु धृतराष्ट्र कुछ ना कर सके। तब दुर्योधन ने द्रौपदी को अपने वस्त्र उतारकर दासी के वस्त्र धारण कर अपनी जंघा पर बैठने का आदेश दिया। द्रौपदी ने जब विरोध किया तो दुर्योधन ने दुशासन को द्रौपदी की साड़ी उतारने का आदेश दिया। दुशासन ने द्रौपदी की साड़ी खींची पर उस वक्त भगवान कृष्ण ने द्रौपदी का साथ दिया। दुशासन साड़ी खींचता रहा और थक हार कर बैठ गया किंतु साड़ी की लंबाई लगातार बढ़ती जा रही थी। अंत में विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया और यह नाटक बंद करने की बात कही। धृतराष्ट्र को भी पांडवों की इस स्थिति पर बहुत दया आई और द्रौपदी से कहा, हालांकि पांडव सब कुछ हार चुके हैं परंतु तुम जो चाहो वह मांग सकती हो।
तब द्रौपदी ने पांडवों की मुक्ति की मांग रखी जिसे धृतराष्ट्र ने स्वीकार कर लिया और कुछ ही देर बाद पांडव और द्रौपदी वहां से अपने रथ में बैठकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल पड़े। धृतराष्ट्र के इस निर्णय से दुर्योधन क्रोधित हो गया और अपने पिता को फटकारा। धृतराष्ट्र पुत्र मोह में पागल तो था ही तो उसने दोबारा पांडवों को जुआ खेलने के लिए आमंत्रित कर दिया। युधिष्ठिर को दोबारा जुआ खेलने का आमंत्रण मिला तो वे दोबारा लौट आए क्योंकि इस बार उन्हें आशा थी कि इस बार शायद वे जीत जाएं। लेकिन इस बार शर्त अलग थी, शर्त यह थी कि जो बाजी हारेगा वह बारह साल के लिए वनों में सामान्य जन की तरह रहेगा और तेरहवां साल अज्ञातवास में गुजारेगा, अज्ञातवास में यह शर्त है कि अगर वह पहचाना गया तो उसे दोबारा तेरह वर्ष के लिए फिर निष्कासित जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। युधिष्ठिर ने यह शर्त मंजूर कर ली और जुए का खेल दोबारा शुरू हुआ। बस फिर क्या था देखते ही देखते शकुनि अपनी चालाकी से बाजी जीतता गया और पांडव शर्त के अनुसार राजपाट छोड़ वन गमन को विवश हो गए।
वनवास
पांडव वनवास जा चुके थे। उनके अनेक मित्र और शुभचिंतक उनसे मिलने वन में यदा-कदा आते रहते थे। द्रौपदी हमेशा पांडवों को अपने अपमान के बारे में याद दिलाती रहती थी जिससे उनका खून खौलने लगता था। भीम ने भी यह प्रण लिया कि वह एक दिन दुर्योधन की जंघा को तोड़ देगा।
पांडवों ने द्रैतवन छोड़ दिया उसके बाद वे काम्यकवन आ गए। यहां युधिष्ठिर ने शुभ मुहूर्त पर पर अर्जुन को महर्षि व्यास द्वारा दिए गए एक श्रुति स्मृति मंत्र को दिया। अर्जुन मंत्र लेकर सीधा कैलाश पर्वत की ओर चले गए और देवताओं की स्तुति की जहां देवता प्रसन्न हुए और एक-एक कर अर्जुन को दर्शन दिए। यहां अर्जुन को कई अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए। इसके बाद अर्जुन विश्राम के लिए इंद्र के पास चले गए और धीरे-धीरे समय बीतता गया और कई वर्षों बाद पांडव हिमालय की ओर गए जहां उनका अर्जुन से पुनर्मिलन हुआ। इसके बाद पांडव द्रौपदी के साथ द्वारका पहुंचे जहां श्रीकृष्ण के महल में अभिमन्यु और द्रौपदी के पांचों पुत्रों का लालन-पालन भली प्रकार से हो रहा था। इस प्रकार पांडवों का बारह वर्ष का वनवास समाप्त हो गया। लेकिन अभी एक वर्ष का अज्ञातवास बाकी था। इसलिए पांडवों ने इस अज्ञातवास में छुपकर रहने की योजना बनाई।
अज्ञातवास
एक दिन पांडव अपने आश्रम से लुप्त हो गए क्योंकि उनका अज्ञातवास आरंभ हो गया था। तब युधिष्ठिर ने आज्ञातवास में किसी के द्वारा ना पहचाने जाने के लिए वेश बदलकर मत्स्य देश चलने की योजना बनाई। क्योंकि युधिष्ठिर का यह मत था कि अगर वे सभी एक साथ रहेंगे तो उन्हें कोई भी आसानी से पहचान जाएगा। इसलिए उन्हें मत्स्य देश के राजा विराट के पास जाकर काम मांगना चाहिए। इस प्रकार सभी ने अपने अपने काम चुन लिए। युधिष्ठिर ने अपना नाम कंक रखा जो ज्योतिष शास्त्र का काम देखेगा एवं धूतक्रोड़ा में राजा का मनोरंजन करेगा। वहीं भीम ने रसोइए का काम लिया और अपना नाम वल्लभ रखा, अर्जुन ने नारी का रूप धारण किया और अपना नाम वृहन्नला रखा और महिलाओं के साथ रहकर और कहानियां सुनाकर उनका मनोरंजन करने का काम लिया, नकुल ने अपना नाम ग्रंथिक रखा और अस्तबल का रखवाला बन गया, सहदेव ने राजा विराट की गौशाला में नौकरी लेने की ठान ली। अंत में द्रौपदी बची तो उसने भी वहां एक दासी के रूप में काम करने की योजना बनाई और अपना नाम सैरंध्री रखा। सभी अपना वेश बदलकर अलग- अलग महाराज विराट के पास पहुंचे और विराट ने उन्हें काम पर रख लिया।
वे प्रसन्न थे क्योंकि शीघ्र ही उनका अज्ञातवास का वर्ष भी समाप्त होने वाला था। कीचक, महारानी सुदेष्णा का भाई था और मत्स्य देश का सेनापति। एक दिन उसने सैरंध्री यानि द्रौपदी को देख लिया और पहली नजर में ही द्रौपदी उसे भाग गई और वह द्रौपदी को आकर्षित करने के प्रयास में जुट गया। द्रौपदी ने उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया तो वह आग बबूला हो गया और एक दिन उसने द्रौपदी को अपनी बाहों में भरना चाहा। द्रौपदी ने कीचक को धक्का दिया और भीम को सारी बातें बताई। इस पर भीम को बड़ा क्रोध आया और उसने द्रौपदी से कहा कि वह कीचक को रात्रि के समय एकांत में नृत्यशाला में बुलाए। जब द्रौपदी ने कीचक को नृत्यशाला में बुलाया तो वहां भीम था। भीम ने मौका पाते ही कीचड़ को अपनी अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसे जमीन पर पटक पटक कर मार डाला।
इधर हस्तिनापुर में दुर्योधन परेशान था क्योंकि अज्ञातवास का समय भी समाप्ति की ओर बढ़ रहा था। दुर्योधन ने पांडवों की खोज में कई गुप्तचर भेजें किंतु पांडवों का कहीं पता न लग सका। तभी दुर्योधन को पता चला कि महाराज विराट का सेनापति कीचक मारा गया है। दुर्योधन सोच में पड़ गया कि कीचक को सिर्फ दो ही प्राणी मार सकते थे, या तो बलराम या फिर भीम। दुर्योधन जानता था कि बलराम को तो कीचक को मारने की क्या पड़ी है तो हो सकता है भीम द्वारा कीचक को मारा गया हो। दुर्योधन का यह मत था कि जब वे मत्स्य देश पर आक्रमण करेंगे और यदि पांडव वहां मोजूद होंगे तो अवश्य ही युद्ध में भाग लेंगे और उस वक्त वे उन्हें पहचान लेंगे। और मत्स्य देश पर दोनो दिशाओं से आक्रमण करने का निश्चय किया। इस आक्रमण में कौरवों की मदद के लिए त्रिगत देश का राजा सुशर्मा भी आ गया।
महाराज विराट इस सूचना को मिलते ही अत्यंत घबरा गए। तब युधिष्ठिर उनके पास आया और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे युद्ध में शत्रुओं का मुकाबला कर सकते हैं। उसने अपने चारों भाइयों की अपनी-अपनी विशेषताएं बताइए जैसे कि वल्लभ यानि भीम के बारे में उसने बताया कि वह बहुत ताकतवर है। जबकि अर्जुन यानि वृहन्नला के बारे में बताया कि वह अर्जुन के रथ का सारथी रहा है। इसी प्रकार नकुल, सहदेव और स्वयं को युद्ध कला में अच्छा बताते हुए उसने युद्ध में राजा विराट से हिस्सा लेने की बात कही। राजा विराट भी इससे प्रसन्न हुए और उन्होंने हामी भर दी।
जब दोनों दिशाओं से मत्स्य देश पर आक्रमण हुआ तो एक तरफ से भीम ने मोर्चा संभाला। लेकिन जब दूसरी ओर से कौरव मत्स्य नगर को लूटते हुए महल की ओर बढ़े तब महल में राजकुमार उत्तर था। वह बहुत ही सीधा-साधा व डरपोक था उसे युद्ध कला का ज्ञान नहीं था। उस वक्त वृहन्नला यानि अर्जुन राजकुमार उत्तर के रथ का सारथी बन गया। उसने रास्ते में पेड़ पर छुपाए हुए अपने हथियारों को भी उठा लिया, जब राजकुमार उत्तर से बिल्कुल भी युद्ध नहीं हुआ तब वृहन्नला ने हथियार उठा लिए और अपनी चोटी खोलकर शंख फूंका जिसकी गंभीर ध्वनि से सारा वातावरण गूंज उठा। दुर्योधन समझ गया कि यह अर्जुन के शंख की ध्वनि है इसका मतलब वह यहीं आसपास है और जैसे ही वह मुकाबले में आएगा तो वह उसे पहचान लेगा और पांडवों को दोबारा तेरह वर्ष के लिए वन भेज देगा।
अर्जुन ने अपने मंत्र सिद्ध अस्त्रों से शत्रु पक्ष को जबरदस्त मात दे दी। जिससे मत्स्य प्रदेश के राजा विराट बहुत खुश हुए और सारी जगह उत्सव का वातावरण छा गया। भीष्म, कृपाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को समझाया कि हिसाब से पांडवों का अज्ञातवास का समय भी अब खत्म हो चुका है। उस दिन पांडवों ने अपने चोले बदल लिए। राजा विराट उनकी वास्तविकता जानकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन पुत्र अभिमन्यु से कर दिया।
श्रीकृष्ण की चेतावनी
अभिमन्यु के विवाह समारोह में सम्मिलित होने श्रीकृष्ण और द्रुपद अपने पुत्र धृष्टद्युम्न के साथ पधारे। वहीं बदले की आग में जल रहा शिखंडी भी आया। इसके अलावा अनेक मित्र नरेश भी पहुंचे। श्रीकृष्ण ने सबको संबोधित करते हुए पांडवों के साथ हुए अन्याय के बारे में बताया। सभी नरेशों ने पांडवों की हर संभव मदद का आश्वासन दिया। आखिरकार आगे की योजनाओं पर विचार विमर्श शुरू हुआ। सभी ने कौरवों के पास एक सुयोग्य दूत को भेजने का निश्चय किया ताकि कौरवों से मित्रता कायम की जा सके और पांडवों को उनका अधिकार मिल सके।
थोड़ा समय बीता, और अर्जुन कुछ विचार विमर्श करने श्रीकृष्ण के पास द्वारका गया। इधर दुर्योधन को जब पता चला कि अर्जुन श्रीकृष्ण के पास द्वारका जा रहा है तो वह भी द्वारका चल पड़ा। श्रीकृष्ण से मिलने के बाद अर्जुन ने स्वयं श्रीकृष्ण का साथ मांगा जबकि दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की सेना का। श्रीकृष्ण ने दोनों को वचन दिया कि उनकी सेना कौरवों के साथ होगी जबकि वे स्वयं पांडवों के साथ। इसके बाद दुर्योधन ने छल से शल्य को वचन दिलाकर उसे भी अपनी सेना में शामिल कर लिया परंतु शल्य ने युधिष्ठिर को एक वचन दिया कि वह ही युद्ध में कर्ण का सारथी बनेगा और पांडवों की जीत में सहायता करेगा।
फिर श्रीकृष्ण ने स्वयं हस्तिनापुर जाकर दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता स्थापित कराने की ठानी। हस्तिनापुर में पहुंचते ही श्रीकृष्ण का भव्य स्वागत किया गया। भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर सभी बहुत खुश थे। उन्हें लगा कि शायद श्रीकृष्ण जरूर इस मसले का हल निकालेंगे। अगले दिन दरबार में सभी एकत्रित हुए। श्रीकृष्ण ने पांडवों का पैगाम सबके सामने रखा, उन्होंने शांति से मसला हल करने के लिए पांडवों को उनका हक सहसम्मान लोटाने के लिए कहा। सभी इस बात पर राजी हुए और धृतराष्ट्र ने भी हामी भरी क्योंकि वह जानते थे कि श्रीकृष्ण कभी गलत निर्णय नहीं लेंगे। यह सुनकर वहां खड़े दुर्योधन की आंखें लाल हो गई और वह क्रोधित हो उठा। वह बोला, आप लोगों को पांडवों से कुछ ज्यादा ही लगाव है, वे जुए में सब कुछ हार चुके हैं और मैं उन्हें कुछ नहीं देने वाला।
ऐसा कहकर दरबार से चला गया। दरबार में सभी चिंतित हो उठे कि आखिर क्या किया जाए। दुर्योधन अंदर जाकर अपने भाइयों से मिला और कहा यह कृष्ण हमारे परिवार को भड़का रहा है और इसके आने से सभी पांडवों का पक्ष ले रहे हैं इसलिए हमें इस इस कृष्ण को ही कैद कर लेना चाहिए। सभी भाई दरबार में श्रीकृष्ण को कैद करने के लिए आ गए। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वे क्रोधित हो उठे तब उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया जिससे सभी भयभीत हो गए। श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र को अंतिम चेतावनी दी और कहा, तुम्हारे पुत्र मोह की आग एक दिन तुम्हारे इस वंश का सर्वनाश कर देगी। अब मैं यहां से जा रहा हूं, क्योंकि अनेक बार समझाने के बाद भी तुम्हें अक्ल नहीं आई, अब अपने विनाश का समय गिनना शुरू कर दो। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण वहां से चले गए।
श्रीकृष्ण उपलव्य नगर दोबारा लौट आए और सभी को संपूर्ण वृत्तांत सुना दिया। शिविर में शांति छा गई क्योंकि उनका यह अंतिम प्रयास भी विफल रहा था। अब होनी को कोई नहीं टाल सकता था।
युद्धपूर्व
पांडवों के पास सात अक्षोहिणी सेना थी। युधिष्ठिर ने सोच विचार कर इन सातों सेनाओं का अधिनायक द्रुपद, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, विराट, शिखंडी, सात्यकि, चेकितान को नियुक्त कर दिया और संपूर्ण सेना का सेनापति धृष्टद्युम्न को बनाया गया।
कौरवों के पास ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी और इसके लिए उन्होंने जो अधिनायक नियुक्त किए थे वे द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, शल्य, शकुनि, सुदक्षिणा, जयद्रथ, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, भूरिश्रवा और वाहिक थे। सेना का प्रधान सेनापति पितामह भीष्म को नियुक्त किया गया था।
युद्ध के नियम थे कि कोई भी पक्ष युद्ध में छल कपट नहीं करेगा। पैदल सैनिक पैदल से लड़ेगा, घुड़सवार घुड़सवार से और रथ पर सवार सैनिक सिर्फ रथ पर सवार सैनिक से। मरणासन्न एवं शरणागत पर कोई हथियार नहीं उठाएगा, सूर्यास्त के बाद युद्ध समाप्त हो जाएगा और अगले दिन सूर्योदय के साथ फिर शुरू होगा।
दूसरे दिन जैसे ही नया सूर्य उदित हुआ दोनों सेनाएं आमने सामने आ गई। पांडवों की ओर से युद्ध आरंभ की घोषणा की गई। शंख की तेज ध्वनि चारों दिशाओं में गूंज उठी। कौरवों की ओर से भीष्म ने भी शंखनाद कर युद्ध आरंभ करने का आदेश दिया। युधिष्ठिर भीष्म पितामह से के पास गए और उनसे आशीर्वाद लिया। अर्जुन के सारथी के रूप में श्रीकृष्ण थे और उन्होंने अर्जुन से रथ को युद्ध के बीचोंबीच ले जाने को कहा। अर्जुन ने रथ दोनों सेनाओं के बीच में लाकर रोक दिया और चारों ओर खड़ी सेनाओं को देखा। अर्जुन ने जब अपने ही परिजन, स्वजन, गुरुजन, बड़े बुजुर्गों को आमने-सामने युद्ध करते हुए देखा तो उसका हृदय भर आया। वह बीच में युद्ध छोड़ देने की बात करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म का पाठ पढ़ाया और कहा, यह सब मोह माया है, प्राणीमात्र नाशवान है और एक दिन सबको ही मरना है। बस एक बात याद रखो कि तुम्हारा धर्म क्या है, धर्म पर चलकर आचरण करना ही इंसान का परम कर्तव्य है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म रक्षा का पाठ पढ़ाया और युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया। इधर हस्तिनापुर में भी धृतराष्ट्र को युद्ध का आंखों देखा हाल मिल रहा था। संजय को महर्षि व्यास ने एक दिव्य दृष्टि प्रदान की जिससे वह युद्ध को वहीं बैठा देख सके और धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुना सके।
धर्मयुद्ध
इस प्रकार युद्ध शुरू हो गया। युद्ध भयंकर तरीके से शुरू हुआ और दोनों ओर से भयंकर युद्ध छिड़ गया। राजकुमार उत्तर पांडवों के पक्ष में था उसने शल्य के हाथी घोड़ों को कुचल दिया जिससे शल्य ने क्रोधित होकर राजकुमार उत्तर पर लोह शक्ति से निशाना साधा जिससे राजकुमार उत्तर बच ना सका और वीरगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर भीष्म पितामह के तेज बाणों से पांडवों की सेना में खलबली मच गई। पांडव सैनिक धराशाई होते हुए दिखाई दे रहे थे।
दूसरे दिन भी पितामह भीष्म ने बाणों की घनघोर वर्षा की। पांडवों को पितामह भीष्म के वारों का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। हजारों सैनिक गाजर मूली की तरह कटते जा रहे थे। तब भीम ने अपना साहस दिखाकर कौरवों के छक्के छुड़ाना शुरू किया।
तीसरा दिन अर्जुन का था। अर्जुन ने अपने गांडीव की ढंकार से कौरव सैनिकों के शव भूमि पर बिछा दिये। परंतु भीष्म ने दोबारा मोर्चा संभाला और पांडवों पर टूट पड़े। भीष्म के बाणों की तेज मार के आगे पांडवों का जोर नहीं चल पा रहा था। तब श्रीकृष्ण ने तय कर लिया कि भीष्म का वध आवश्यक है। इसलिए उन्होंने शिखंडी को अपने पास बुलाया यह वही शिखंडी था जिसने भीष्म को मारने का प्रण किया था, जो स्त्री के रूप में पुरुष था। श्रीकृष्ण के कहे अनुसार अर्जुन ने अपने रथ के आगे शिखंडी को बिठा दिया और रथ को भीष्म की तरफ बढ़ा दिया। भीष्म को ज्ञात था कि उनकी मृत्यु निकट आ चुकी है क्योंकि शिखंडी उनकी नजर में एक नारी थी और नारी पर वार करना भीष्म के सिद्धांतों के विरुद्ध था। रथ के भीष्म के पास पहुंचते ही अर्जुन ने शिखंडी की ओट में छिपकर अपने धनुष से बाणों की वर्षा छोड़ दी और भीष्म का सारा शरीर तीरों से बिंद गया और वे नीचे गिर पड़े। तीर शरीर में इस तरह लगे कि वे जमीन पर नहीं गिरे बल्कि तीरों की शैया पर जा पड़े।
युद्ध दोबारा शुरू हुआ। इस बार कर्ण युद्ध में हिस्सा लेने आया और गुरु द्रोणाचार्य को सेनापति का दायित्व सौंपा गया। इस बार दुर्योधन ने चालाकी से युधिष्ठिर को जीवित पकड़ने की योजना बनाई ताकि युद्ध को जीता जा सके। त्रिगत नरेश सुशर्मा को अर्जुन से लड़ने भेज दिया गया ताकि अर्जुन एक मोर्चे पर व्यस्त रहे और इधर द्रोणाचार्य ने एक भव्य व्यूह की रचना की ताकि युधिष्ठिर को जीवित बंदी बनाया जा सके। यह चक्रव्यूह था और इसमें कोई फंस जाता तो उसका निकलना मुश्किल था। इस चक्रव्यूह से निकलने का भेद या तो सिर्फ अर्जुन को मालूम था या अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को। इसमें प्रवेश कैसे करना है यह तो अभिमन्यु को आता था पर तोड़कर बाहर कैसे आना है यह नहीं।
चक्रव्यूह रचित होने के बाद युधिष्ठिर ने अभिमन्यु को चक्रव्यूह में भेज दिया और कहा कि पीछे से वे सभी उसकी रक्षा के लिए आएंगे। अभिमन्यु चक्रव्यूह में कूद पड़ा परंतु अभिमन्यु के जाने के बाद कौरवों ने किसी भी पांडव को चक्रव्यूह के अंदर प्रवेश नहीं होने दिया। देखते ही देखते अभिमन्यू पर सभी कौरव समेत जयद्रथ टूट पड़ा। अभिमन्यु अकेला था किंतु उसने सभी का डटकर सामना किया और अपने वार से राजा बृहदबल के अलावा दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण व मद्रराज का पुत्र रुक्म भी मारा गया। अंत में दुर्योधन, अश्वत्थामा, कर्ण, जयद्रथ सभी अभिमन्यु के ऊपर टूट पड़े और जयद्रथ के प्रहारों से अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया।
इधर अर्जुन सुशर्मा का वध कर वापस लौटा तो अभिमन्यु की मौत का समाचार सुन उसका क्रोध के मारे बुरा हाल हो गया। जयद्रथ अभिमन्यु को मृत्यु के पश्चात घबराया हुआ कौरव सेना के बीच छिपकर बैठा था। तब श्रीकृष्ण ने सूर्य को बादलों से ढक लिया, सभी ने सोचा सूर्यास्त हो गया है और जयद्रथ के पास से सभी सुरक्षा हटा ली गई लेकिन तभी बादल छट गए और अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर दिया और अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लिया।
अगले दिन भीम कौरवों को बुरी तरह मार रहा था। उसने दुर्योधन के ग्यारह भाइयों को मौत के घाट उतार दिया। वहीं भीम पुत्र घटोत्कच कर्ण पर टूट पड़ा और कर्ण को बुरी तरह घायल कर दिया। उस समय कर्ण ने इंद्र का दिया हुआ एक अस्त्र इस्तेमाल किया जो सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल हो सकता था और इसके वार से घटोत्कच बच ना सका और मारा गया। द्रोणाचार्य के नेतृत्व में कौरव पांडवों का बराबरी से मुकाबला कर रहे थे। तब श्रीकृष्ण ने गुरु द्रोणाचार्य को मारने की योजना बनाई। उन्होंने कहा कि यदि गुरु द्रोणाचार्य से यह कहा जाए कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया तो वह पूरी तरह टूट जाएंगे और उस समय हम इसका फायदा उठाकर उनका वध कर सकते हैं।
तब भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मार गिराया और गुरु द्रोणाचार्य तक यह खबर पहुंचा दी कि अश्वत्थामा मारा गया। शुरू में तो द्रोणाचार्य को यह विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब युधिष्ठिर ने भी द्रोणाचार्य से यह कहा कि अश्वत्थामा मारा गया तो गुरु द्रोणाचार्य टूट गए और उन्होंने अपने हथियार छोड़ दिए। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ की उनका पुत्र इस तरह मर सकता है। तब धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य के रथ पर कूद पड़ा और अपनी म्यान से तलवार निकालकर इनके सिर को धड़ से अलग कर दिया और इस प्रकार उसने अपने पिता द्रुपद के अपमान का बदला भी ले लिया। इसके बाद भीम ने दुशासन का वध कर द्रौपदी के चीरहरण का बदला लिया।
द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाया। कर्ण ने भी युद्ध मैदान में पांडवों पर कहर बरपा दिया। शल्य कर्ण का सारथी था, वह कर्ण के रथ को अर्जुन के निकट ले गया। अर्जुन के निकट पहुंचते ही कर्ण ने अस्त्र चलाना शुरू किया और अर्जुन को कड़ा मुकाबला दिया। लेकिन तभी कर्ण का रथ कीचड़ में जा फंसा और शल्य ने युधिष्ठिर को दिये वचन के अनुसार कर्ण की सहायता नहीं की। तब कर्ण ने अर्जुन से कहा, मुझे अपना रथ ठीक करने दो फिर वार करना। कर्ण अपने रथ का पहिया कीचड़ से निकालने में लग गया। परंतु तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि इसने भी निहत्थे अभिमन्यु पर वार किया था, द्रौपदी का अपमान किया था, अर्जुन तुम तीर चलाओ।
जब कर्ण ने देखा कि अर्जुन उस पर तीर चला रहा है तो उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र चलाने की सोची परंतु एक शाप के कारण वह भूल गया कि यह किस मंत्रोच्चारण से चलाया जाता है। अर्जुन ने बिना समय गवाएं गांडीव उठाया और एक तीर से कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। इधर शल्य भी अपनी सेना के साथ युधिष्ठिर द्वारा मारा गया और भीम ने बचे कुचे धृतराष्ट्र के पुत्रों को यमलोक पहुंचा दिया। अब सिर्फ दुर्योधन, कृपाचार्य और अश्वत्थामा ही कौरव की तरफ से बचे हुए थे। इसके बाद दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया।
अब दुर्योधन यह समझ चुका था कि उसका जीतना मुश्किल है इसलिए वह एक झील में जाकर छुप गया जहां युधिष्ठिर ने उसे पकड़ लिया। उसे सभी के सामने लाया गया जहां पर भीम ने दुर्योधन से गदा युद्ध लड़ा। इस गदा युद्ध में दोनों ही बड़ी वीरता से लड़ रहे थे। दुर्योधन भी भीम से कम नहीं था लेकिन तभी श्रीकृष्ण ने भीम को याद दिलाया कि उसने दुर्योधन की जांघ तोड़ने की प्रतिज्ञा की थी। भीम गुस्से में भूल गया कि गदा युद्ध में पेट से नीचे वार करना युद्ध नियमों के खिलाफ है। उसने दुर्योधन की जांघों पर जोरदार गदा मारी, दुर्योधन लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़ा और भीम ने उसके सिर पर एक ही वार से उसे मौत के घाट उतार दिया।
इधर अपने पिता की मृत्यु से क्रोधित अश्वत्थामा ने चुपचाप पांडवों के शिविर में जाकर तबाही मचा दी। उसने न सिर्फ द्रौपदी के पांचों पुत्रों को सोते हुए मार डाला बल्कि पांडवों की बची कुची सेना को भी मार डाला। इससे पांडव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अश्वत्थामा को गंगा किनारे किसी आश्रम में ढूंढ निकाला। इस बार अश्वत्थामा और पांडवों में फिर संग्राम छिडा और अश्वत्थामा अपनी पराजय स्वीकार कर जंगलों की ओर निकल गया और फिर कभी नहीं लोटा। इधर धृतराष्ट्र बिल्कुल मौन थे उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया।
अंत
कुल मिलाकर इस युद्ध का यह परिणाम निकला कि सारा हस्तिनापुर मर्दो से खाली हो गया। हस्तिनापुर में सिर्फ आंसुओं की धारा बह रही थी। तत्पश्चात एक माह का शोक मनाने के लिए पांडव धृतराष्ट्र, विदुर एवं समस्त रानियों के साथ हस्तिनापुर से बाहर चले गए और विधिवत शोक मनाया। इसके बाद युधिष्ठिर राज सिंहासन पर बैठा और उसने कुल छत्तीस वर्ष तक राज किया। उसने सभी का पूर्ण ख्याल रखा।
उधर श्रीकृष्ण के समस्त यदुवंशी आपस में लड़ लड़ कर नष्ट हो गए और एक दिन एक शिकारी ने श्रीकृष्ण के पैरों को चिड़िया समझकर तीर चला दिया और इस प्रकार विष्णु के आठवें अवतार के रूप में उनका काल समाप्त हुआ। श्रीकृष्ण के अंतर्धान से यदुवंशी एकदम टूट गए और द्वारका को समुद्र के हवाले करके खुद भी डूब गए।
पांडवों ने भी यह निर्णय कर लिया कि अब इस संसार को त्याग देना चाहिए और एक दिन वे भी हिमालय की यात्रा पर निकल पड़े और वहीं एक-एक कर मृत्यु का वरण कर लिया। महाभारत के युद्ध में अंत में कोई भी जीवित नहीं बचा। सिर्फ अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित एकमात्र जीवित रह गया था जो आगे चलकर हस्तिनापुर का सम्राट बना और उसने पांडवों के वंश को आगे बढ़ाया।
