॥ बुधवार व्रत कथा ॥
» बुधवार व्रत विधि
* बुधवार का नियमित व्रत करने से अरिष्ट ग्रहों की शांति एवं सर्व-सुखों की प्राप्ति होती है। तथा बुद्धि बढ़ती है।
* इस दिन प्रातः उठकर संपूर्ण घर की सफाई करें। तत्पश्चात स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। इसके बाद पवित्र जल का घर में छिड़काव करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान बुध या शंकर भगवान की मूर्ति अथवा चित्र किसी कांस्य पात्र में स्थापित करें। तत्पश्चात धूप, बेल-पत्र, अक्षत और घी का दीपक जलाकर पूजा करें। भगवान को सफेद फूल तथा हरे रंग की वस्तुएँ चढ़ाएँ।
* इसके बाद निम्न मंत्र से बुध की प्रार्थना करें- बुध त्वं बुद्धिजनको बोधदः सर्वदा नृणाम्। तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नमः ॥
* बुधवार की व्रतकथा सुनकर आरती करें । इसके पश्चात गुड़, भात और दही का प्रसाद बाँटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें । रात दिन में एक ही बार भोजन करना चाहिए।
* किसी भी रूप में व्रतकथा को बीच में छोड़कर, प्रसाद ग्रहण किए बिना कहीं नहीं जाना चाहिए |
॥ बुधवार व्रत (बुध प्रदोष) कथा ॥
समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदर और गुणवती लड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया। मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते। लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही।
दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहाँ से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया। थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई। मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा - तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो? मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा - अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?
मधुसूदन ने लगभग चीखते हुए कहा - तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था। इस पर उस व्यक्ति ने कहा - अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो। संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था । मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूँगा।
दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहाँ एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहाँ आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी। राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।
मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूँगा।
मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मान पूर्वक विदा किया । कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंद पूर्वक जीवन-यापन करने लगे।
भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी। जल्दी ही उनके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर गई। बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुषों के जीवन में सभी मंगलकामनाएँ पूरी होती हैं।
॥ बुधवार की आरती ॥
* आरती युगल किशोर की कीजे, तन-मन-धन, न्योछावर कीजे ॥ ॥१॥ आरती युगल किशोर की कीजे
* गौर श्याम सुख निरखत रीझै, हरि को स्वरूप नयन भरी पीजे॥ ॥२॥ आरती युगल किशोर की कीजे
* रवि शशि कोटि बदन की शोभा । ताहि निरिख मेरो मन लोभा ॥ ॥ ३॥ आरती युगल किशोर की कीजै
* ओढे नील पीत पट सारी, कुंज बिहारी गिरवर धारी ॥ ॥४॥ आरती युगल किशोर की कीजे
* फूलन की सेज फूलन की माला, रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला ॥ ॥ ५॥ आरती युगल किशोर की कीजै
* मोर-मुकुट मुरली कर सोहे, नटवर कला देखि मन मोहे ॥ ॥ ६॥ आरती युगल किशोर की कीजै
* कंचन थार कपूर की बाती, हरि आए निर्मल भई छाती ॥ ॥७॥ आरती युगल किशोर की कीजे
* श्री पुरुषोत्तम गिरवरधारी, आरती करें सकल ब्रजनारी ॥ ॥ ८ ॥ आरती युगल किशोर की कीजे
* नन्दनन्दन ब्रजभान किशोरी, परमानन्द स्वामी अविचल जोरी॥ ॥९॥ आरती युगल किशोर की कीजे
