॥ शनिवार व्रत कथा ॥
» शनिवार व्रत विधि
* शनि व्रत अम्नि पुराण के अनुसार शनि ग्रह की मुक्ति के लिए "मूल" नक्षत्र युक्त शनिवार से आरंभ करके सात शनिवार शनिदेव की व्रत एवं पूजा की जाती है।
* व्रत रखने के लिए सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नान करें । इसके बाद पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करना चाहिए ।
* शनि देवता की लोहे की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए । शनिदेव की प्रतिमा को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करें । शनिदेव की पूजा में काले तिल, काला वस्त्र, काला उडद, और तेल सम्मिलित करें ।
* शनिदेव के १० नामों का उच्चारण अवश्य करें । ये नाम इस तरह है- कोणस्थ, कृष्ण, पिप्पला, सौरि, यम, पिंगलो, रोद्रोतको, बश्रु, मंद, शनैश्चर ।
* शनिदेव के पूजन के पश्चात् पीपल के वृक्ष के तने पर सूत के धागे से ७ बार परिक्रमा करें ।
॥ शनिवार व्रत कथा - १॥
एक समय स्वर्गलोक में 'सबसे बड़ा कौन?' के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे। इंद्र बोले- मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हँ। हम सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं।
देवराज इंद्र सहित सभी ग्रह (देवता) उज्जयिनी नगरी पहुँचकर राजा विक्रमादित्य से अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा। देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वहीं सबसे बड़ा है।
राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- राजा विक्रमादित्य! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा। इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परन्तु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहाँ से विदा हुए।
राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री-पुरुष आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। उधर शनि देवता अपने अपमान को भूले नहीं थे। विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुँचे। राजा विक्रमादित्य ने एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया। घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा। घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहाँ गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। राजा को भूख-प्यास लग आई।
बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला। राजा ने उससे पानी माँगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अँगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से निकलकर पास के नगर में पहुँचा। राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्जयिनी नगरी से आया हूँ। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई।
सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और खुश होकर उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूँटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया। तभी राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूँटी निगल गई। सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का संदेह में अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बाँधकर नगर के राजा के पास ले चलो।
राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते-देखते खूँटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होते हुए चोरी के अपराध में सैनिकों से कहा कि विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया जाय। कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलो को हाँकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई।
राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा। दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी ने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया।
राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए। रानी ने मोहिनी को समझाया। राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी अपनी जिद पूरी कराने के लिए प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया। आखिर राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- राजा मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है। राजा ने शनिदेव से क्षमा मांगी और प्रार्थना की- हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।
शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा- राजा! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी।
प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पाँव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पाँव सही-सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई। तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई।
सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुँचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और अपने घर लेगया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय उस खूँटी ने हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।
राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुँचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हें। प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा सुनें। राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएँ शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनंद पूर्वक रहने लगे।
॥ शनिवार व्रत कथा - २॥
भगवान सूर्य के पुत्र शनि बचपन में बहुत सुंदर थे। गंधर्व ने अपनी पुत्री कंकाली के साथ शनि देव का विवाह करा दिया। शनिदेव अत्यंत सुंदर होने के कारण इंद्र की सभा के अप्सरा अक्सर इन्हें देखने जाया करती थी। इन अप्सरा को देखकर कई बार शनि देव उन पर मोहित हो जाया करते थे। यह बात गंधर्व पुत्री कंकाली को अच्छी नहीं लगती थी। तब गंधर्व पुत्री कंकाली ने अपने पति शनिदेव को यह श्राप दे दिया कि आज के पश्चाताप सुंदरता को खोकर बदसूरत हो जाए और आपकी दृष्टि हमेशा नीचे की तरफ रहे अगर आप सीधी दृष्टि से किसी की तरफ देखते हैं। तो उस पर साढ़ेसाती का प्रभाव पड़ जाएगा।
तब शनिदेव भगवान शिव की घोर तपस्या की तपस्या के पश्चात भगवान शिव प्रसन्न हुए और बोले हे सूर्यपुत्र शनिदेव वर मांगो। तब शनिदेव बोले यह सदा शिव शंभू हम पर कृपा करके हमें सृष्टि पर सीधे देखने के लिए वर दीजिए भगवान शिव भोले जो व्यक्ति शनिवार के दिन पीपल के नीचे तेल चढ़ायेगा उस पर तुम्हारे पढ़ने वाले को दृष्टि शुभ दृष्टि में बदल जाएगी इसीलिए शनिवार के दिन पीपल के नीचे शनिदेव की पूजा होती है।
॥ शनि प्रदोष व्रत कथा - ३॥
प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। लेकिन उनके सन्तान ना थी।
एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी। मगर सेठ पति-पत्नी धैर्य पूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे।
अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति-पत्नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले - मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मै तुम्हारे धैर्य और भक्ति-भाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं। साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई
* हे रुद्रदेव शिव नमस्कार । शिव शंकर जगगुरु नमस्कार ॥
* हे नीलकंठ सुर नमस्कार । शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥
* हे उमाकान्त सुधि नमस्कार । उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
* ईशान ईश प्रभु नमस्कार विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥
तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियम पूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्नी ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया। दोनों आनन्द पूर्वक रहने लगे।
॥ शनिवार (शनिदेव) की आरती - १॥
* जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी । सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥ जय जय श्री शनि देव....
* श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी । नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥ जय जय श्री शनि देव....
* क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी। मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी ॥ जय जय श्री शनि देव....
* मोदक मिष्ठान पान चढत हैं सुपारी । लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥ जय जय श्री शनि देव....
* देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी । विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥ जय जय श्री शनि देव....
॥ शनिवार (शनिदेव) की आरती - २॥
* जय शनि देवा, जय शनि देवा, जय जय जय शनि देवा । अखिल सृष्टि में कोटि-कोटि जन करें तुम्हारी सेवा ।
* जा पर कुपित होउ तुम स्वामी, घोर कष्ट वह पावे । धन वैभव और मान-कीर्ति, सब पलभर में मिट जावे ॥
* राजा नल को लगी शनि दशा, राजपाट हर लेवा । जय शनि देवा, जय शनि देवा, जय जय जय शनि देवा॥
* जा पर प्रसन्न होउ तुम स्वामी, सकल सिद्धि वह पावे । तुम्हारी कृपा रहे तो, उसको जग में कौन सतावे ।
* ताँबा, तेल और तिल से जो, करें भक्तजन सेवा । जय शनि देवा, जय शनि देवा, जय जय जय शनि देवा ॥
* हर शनिवार तुम्हारी, जय-जय कार जगत में होवे। कलियुग में शनिदेव महात्तम, दुःख दरिद्रता धोवे।
* करू आरती भक्ति भाव से भेंट चढ़ाऊं मेवा । जय शनि देवा, जय शनि देवा, जय जय जय शनि देवा ॥
॥ शनिवार (शनिदेव) की आरती - ३॥
* जय जय शनिदेव महाराज जन के संकट हरने वाले ॥
* तुम सूर्यपुत्र बलधारी, भय मानत दुनिया सारी जी। साधत हो दुर्लभ काज ॥ ॥ १॥
* तुम धर्म राज के भाई, जम क्रुरता पाई जी । घन गर्जन करत आवाज ॥ ॥२॥
* तुम नील देव विकरारी, भैसा पर करत सवारी जी। कर लोह गदा रहे साज ॥ ॥ ३॥
* तुम भूपति रंक बनाओ, निर्धन सिर छत्र धराओं जी । समरथ हो करन मम काज ॥ ॥ ४॥
* राजा को राज मिटायो, निज भक्तो फेर दिवायो जी । जग में हो रही जय जय कार ॥ ॥५॥
* तुम हो स्वामी, हम चरण सिर करत नमामि जी । पुरवो जन जन की आस ॥ ॥ ६॥
* यह पूजा देव तिहारी, हम करत दीन भाव ते पारी जी । अंगीकृत करो कृपालु जी ॥ ॥ ७॥
* प्रभु सूधि दृष्टि निहारो, क्षभिये अपराध हमारों जी। हैं हाथ तिहारे ही लाज ॥ ॥८॥
* हम बहुत विपति घबराये, शरनागति तुमरी आये जी । प्रभु सिद्ध करो सब काज ॥ ॥ ९॥
* यह विनय भक्त “सुनावे, नित जय जयकार मनावे जी । तुम देवं के सिर ताज ॥ ॥१०॥
