रामायण 20 मिनट में

रामायण 20 मिनट में

BALAK RAM

रामजन्म 

त्रेता युग में सरयू नदी के तट पर यह कोशल राज्य था, जो वैभवशाली और अत्यंत संपन्न था और यहां की राजधानी का नाम अयोध्या था। कोशल के राजा दशरथ अत्यंत पराक्रमी और कुशल शासक थे। उनके राज्य की प्रजा बहुत ही सुखी और समृद्ध थी। राजा दशरथ की तीन रानियां थी कौशल्या, सुमित्रा और केकैयी। राजा दशरथ को सभी प्रकार के सुख प्राप्त थे किंतु एक सुख अभी भी उनके जीवन में नहीं था वह था संतान सुख। उनकी उम्र बढ़ती ही जा रही थी। इन्हीं घनीभूत निराशा के क्षणों में उन्हें अपने गुरु वशिष्ठ की याद आई उन्होंने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में जाने का निर्णय किया। राजा दशरथ को अपने आश्रम में देखकर गुरु वशिष्ट ने उनसे पूछा, “अरे राजन आप इतने दुखी दिखाई क्यों दे रहे हैं।“ राजा दशरथ ने कहा, “गुरुदेव मैं अब बूढ़ा हो चला हूं और एक दिन मृत्यु को भी प्राप्त हो जाऊंगा। अगर संतान नहीं हुई तो सूर्यवंश का अंत निश्चित है। आप ही बताइए मैं क्या करूं। “

गुरु वशिष्ट ने राजा दशरथ को पुत्रकाम यज्ञ का अनुष्ठान करने की सलाह दी। बस यज्ञ की तैयारियां आरंभ हो गई और सरयू नदी के तट पर विशाल यज्ञ वेदी का निर्माण किया गया ऋषि शृंगी को यज्ञ के लिए अयोध्या बुलाया गया। यज्ञ समाप्ति के पश्चात ऋषि श्रृंगी ने अग्निकुंड में घृताहुति दी और अग्निकुंड से भारी लपटों के साथ एक स्वर्ण कलश निकला। ऋषि शृंगी ने स्वर्ण कलश राजा दशरथ को देते हुए कहा, “राजन इसमें खीर है, आप यह खीर अपनी रानियों को खिला दें उन्हें अवश्य ही संतान प्राप्ति होगी। राजा दशरथ का खुशी का ठिकाना नहीं रहा और तीनों रानियों ने खीर का पान किया। समय आने पर तीनों ही रानियां गर्भवती हो गई और चैत्र शुक्ल नवमी तिथि में कर्क लग्न में कौशल्या ने राम को जन्म दिया। सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न एवं केकई ने भरत को जन्म दिया। पूरे अयोध्या में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई । 


शिक्षा 

छ: वर्ष की आयु में चारों राजकुमारों का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। राजा दशरथ ने उन्हें महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा अर्जन के लिए भेज दिया। राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न ने आश्रम में नियमपूर्वक रहकर विद्यार्जन किया और चारों राजकुमारों ने समयानुसार विद्या सफलतापूर्वक अर्जित कर ली और वे वेद, पुराण, इतिहास, शास्त्र, अस्त्र आदि के अलावा संपूर्ण कलाओं में पारंगत हो गए। राजा दशरथ अपने पुत्रों की योग्यता व शिक्षा दीक्षा से बहुत संतुष्ट थे और चारों का ही यश अल्पायु में ही चारों ओर फैलने लगा था। 

एक दिन राजा दशरथ और राजगुरु वशिष्ट में विचार-विमर्श चल ही रहा था कि तभी द्वारपाल ने दरबार में प्रवेश किया एवं बताया कि महामुनि विश्वामित्र उनसे मिलना चाहते हैं। राजा दशरथ तत्काल अपने आसन से उठे और स्वयं जाकर महर्षि विश्वामित्र का स्वागत किया। राजा दशरथ ने विश्वामित्र से उनके आगमन का कारण पूछा। विश्वामित्र बोले, “राजन मैं एक यज्ञ कर रहा हूं लेकिन मारीच और सुबाहु नामक दो राक्षस आते हैं और यज्ञ को अपवित्र कर उसे भंग कर देते हैं। इसलिए मैं आपके पास आया हूं आप राजा हैं और मैंने सुना है कि आपका पुत्र राम समर्थ है वह चाहे तो मुझे इस कष्ट से उबार सकता है इसलिए आप राजकुमार राम को मुझे प्रदान कीजिए मैं उसे अपने साथ लेकर जाना चाहता हूं।“ यह सुनकर राजा दशरथ अत्यंत चिंतित हो गए और उन्होंने स्वयं विश्वामित्र के साथ चलने को बात कही। किंतु विश्वामित्र को राम पर पूर्ण विश्वास था। अंत में राजा दशरथ राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ ले जाने पर सहमत हो गए। 

विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर दरबार से निकले। उन्हें मार्ग में विश्वामित्र ने बला और अतिबला नामक विद्या सिखाई। मार्ग में अंगदेश पड़ा, गंगा सरयू के संगम पर पहुंचे। विश्वामित्र के साथ दोनों ने यहां कामाश्रम में रात बिताई और दूसरे दिन उनकी अगली आगे की यात्रा आरंभ हुई। इसके बाद विश्वामित्र राम और लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचे वहां के वनवासियों ने उन्हें एक नौका दी जिस पर बैठकर उन्होंने नदी पार की। आगे सघन वन था और वन में अनेक पशुओं का स्वर गूंज रहा था और भयानक अंधकार छाया हुआ था। राम ने विश्वामित्र से उस वन के बारे में पूछा विश्वामित्र ने बताया कि आज तो यह जंगल बहुत ही भयानक है लेकिन यहां पर कभी समृद्धि देश बसे हुए थे लेकिन सुंद नामक राक्षक की पत्नी ताड़का और उसके साथ आया उसका पुत्र मारीच ने मिलकर इस समृद्ध देश क्षेत्र को तहस-नहस कर डाला इस हरे भरे क्षेत्र को तबाह कर दिया है। तुम इस तड़का को मारकर पृथ्वी के पाप को समाप्त कर सकते हो। राम ने कहा मुनिवर आपकी आज्ञा शिरोधार्य मैं ताड़का को मारकर मानव मात्र का अवश्य कल्याण करूंगा। राम ने अपना धनुष उठाया और ताड़का को मृत्यु लोक पहुंचा दिया। इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने वर्षों की तपस्या से प्राप्त अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान राम को दिया। 

तब वे सिद्धाश्रम पहुंचे और विश्वामित्र ने बताया कि मैंने अपना यज्ञ यहां निर्विघ्न समाप्त करने की बहुत कोशिश की किंतु राक्षसों के विरोध के कारण मैं इसमें सफल नहीं हो सका हूं। अब तुम्हें ही इससे हमारी रक्षा करनी होगी। राम और लक्ष्मण ने यह आग्रह खुशी-खुशी स्वीकार किया। प्रात: काल सभी तपस्वी यज्ञ स्थल पहुंचे और ऋषि विश्वामित्र ने यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्ज्जलित की और अगले ही पल वातावरण में पवित्र श्लोकों के स्वर गूंजने लगे। पांच रातें तो निर्विघ्न समाप्त हो गई। जब छठी रात आई तो आकाश में शोर गूंजने लगा राम लक्ष्मण समझ गए कि यह राक्षस मारीच और सुबाहु अपने साथियों के साथ आ चुका है। हाथों में अपवित्र वस्तु में लेकर जैसे ही राक्षस सेना निकट पहुंची तो राम और लक्ष्मण ने तीरों की वर्षा करके राक्षसों को मारना शुरू कर दिया। राम के एक बाण से तो सुबाहि जलकर भस्म हो गया वहीं दूसरे बाण से मारीच लगभग आठ सौ मील उड़ता हुआ दूर जाकर गिरा। इसके अलावा आए समस्त राक्षस तीरों की धारा मैं तड़प तड़प कर मर गए और यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया सारा वातावरण राम-लक्ष्मण की जय जयकार से गुजरने लगा। 


विवाह

उस समय सिद्धाश्रम में यह सूचना पहुंची कि मिथिला नरेश राजा जनक अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर अनुष्ठान कर रहे हैं। महर्षि विश्वामित्र ने बताया कि राजा जनक के पास एक अद्वितीय शिव धनुष है जो देवताओं ने जनक के पूर्वजों को यज्ञ से प्रसन्न होकर दिया था। इसकी विशेषता यह है कि इसे बली से बली प्राणी भी नहीं उठा सकता अनेकों वीर राजाओं के राजकुमारों ने धनुष उठाया उठाना चाहा किंतु कोई सफल नहीं हो सका। राजा जनक की एकमात्र शर्त यही थी जो कोई भी यह धनुष उठा लेगा उसे ही सीता पति के रूप में स्वीकार करेगी। महर्षि विश्वामित्र का शुभ मुहूर्त पर राम और लक्ष्मण के साथ मिथिला की ओर चल पड़े एवं मिथिला नगर पहुंच गए। यहां चारों और सीता के स्वयंवर की चर्चा थी विश्व के कोने-कोने से अनेकों राजा व राजकुमार आए हुए थे। राजा जनक को जैसे ही विश्वामित्र एवं राम एवं लक्ष्मण के आने की सूचना मिली तो वे स्वयं उनका आदर सत्कार करने पहुंचे एवं अपनी प्रसन्नता व्यक्त की विश्वामित्र ने राम एवं लक्ष्मण का परिचय करवाया। 

अगले दिन स्वयंवर का कार्यक्रम शुरू हुआ। जनक ने घोषणा सुना दी कि जो भी इस पिनाक धनुष को उठाकर इस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसे ही सीता वरमाला पहनाएगी। दुर्भाग्यपूर्ण कोई भी राजा अथवा राजकुमार धनुष को हिला भी नहीं सका और सभी असफल होकर लज्जा और ग्लानि से चुपचाप अपने अपने आसनों पर सिर झुकाए बैठ गए। तब विश्वामित्र के आदेश पर राम धनुष के पास गए और उन्होंने हाथ बढ़ाकर बड़े ही सहज भाव से धनुष उठा लिया और अगले ही पल उन्होंने धनुष की प्रत्यंचा इतनी जोर से खींची की भयंकर गर्जना करता हुआ धनुष बीच में ही दो खंडों में टूट गया। धनुष के टूटते ही पृथ्वी कांप उठी और चारों और धनुष के टूटने का भव्य धमाका गूंज गया। तब प्रसन्न मुद्रा में राजा जनक अपने आसन से उठे और उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए बोले। मैं सूर्यवंशी राजकुमार राम के शौर्य से अत्यंत प्रसन्न हुआ। सचमुच इनके रहते पृथ्वी वीरों से कभी वंचित नहीं रह सकती। मुझे अपनी पुत्री सीता के लिए ऐसा सुयोग्य वर मिला यह मेरी पुत्री का सौभाग्य है। जाओ पुत्री राम के गले में वरमाला डाल दो। सीता धीरे धीरे कदम उठाती हुई धनुष वैदी की ओर बढ़ी जहां राम प्रेम भाव से सीता को देख रहे थे। सीता ने हाथ उठाकर राम के गले में वरमाला डाल दी और आजन्म उनकी हो गई। 

विश्वामित्र ने दूत को अयोध्या भेजकर महाराज दशरथ को यह शुभ सूचना पहुंचाई एवं विवाह में आने का निमंत्रण भेजा। राजा दशरथ अपने जेष्ठ पुत्र के विवाह की सूचना पाकर फूले न समाए एवं शीघ्र ही मिथिला की यात्रा का सारा प्रबंध किया जाए। इसके बाद राजा दशरथ मिथिला पहुंचे और अपने स्वागत एवं सत्कार को देखकर वह हैरान हो गए। सीता का विवाह राम के साथ बड़ी धूमधाम से हुआ, उसी अवसर पर सीता की छोटी बहन उर्मिला लक्ष्मण को ब्याही गई। इसके अतिरिक्त महाराज जनक के भाइ कुशध्वज की दो पुत्रियों मांडवी और श्रुतिकीर्ति का विवाह राम के शेष दो छोटे भाइयों भरत तथा शत्रुघ्न के साथ संपन्न हुआ। 


राज्याभिषेक 

राजमहल में आनंद अपने चरमोत्कर्ष पर था। प्रेम और अनुराग में बारह वर्ष कैसे बीत गए इसका किसी को पता भी ना चल सका, राजा दशरथ वृद्ध हो चले थे राज्य कार्य से निवृत्त होकर अब वे आराम करना चाहते थे। राम मे सारे गुण मौजूद थे जो एक योग्य शासक में होने चाहिए अत: राजा दशरथ अपने बाद राम को ही कोशल नरेश बनाना चाहते थे। एक दिन राजा दशरथ ने सभी प्रमुख जनों ऋषि-मुनियों में मंत्रियों को में राजसभा बुलवाया और कहा, “हे गुणीजनों अब तक मैंने अपने सामर्थ्य अनुसार प्रजा का पालन किया अब लेकिन मैं वृद्ध हो चला हूं और चाहता हूं यह कार्यभार राम को सौंप दूं राम समर्थ है, नीतिवान है, शास्त्रों में पारंगत हैं, सुशील है, सदाचारी हैं, प्रजा वत्सल है उन्हें सिंहासन पर बिठाना आपके विचार से कैसा रहेगा।“ दरबार में उपस्थित सभी लोगों बहुत ही प्रसन्न हुए और सभी ने एक स्वर में कहा, “निश्चय ही उचित विचार है महाराज, राम जैसा राजा पाकर तो हम धन्य हो जाएंगे।“ बस फिर क्या था राज्याभिषेक का समय चैत्र मास निश्‍चित किया गया। राम ने भी राजा दशरथ की आज्ञा को स्वीकारा। 


सिंहासन 

अयोध्या में उत्साह छाया हुआ था सभी जगह पूरे अयोध्या को दुल्हन की तरह सजाया गया था कल राम का राज्याभिषेक जो होना था लेकिन इस सुंदर सजी हुई अयोध्या को राज महल के झरोखे से देख रही थी केकैयी की परिचारिका मंथरा तेज कदमों से चलती हुई केकैयी के कमरे में जा पहुंची और तेज स्वर में बोली, कितनी भोली हो तुम केकई तुम्हें क्या पता राम के राजा बनते ही तुम्हारी दुर्दशा कैसी होगी मैं सदा तुम्हारा हित ही तो चाहती हूं सो यह अन्याय मुझसे देखा नहीं जाता देखो तो कैसा षड्यंत्र रचा गया है भरत को ननिहाल भेज दिया गया और पीछे से राम को राजा बनाया जा रहा है। तुम कौशल्या की दासी कहलाओगी और भरत राम का दास चाहे कुछ भी हो कौशल्या है तो तुम्हारी सौतन ही ना। तुम्हारा भला बुरा सोचना मेरा फर्ज है और इसीलिए मैं यहां तुम्हारे साथ आई हूं। तुमने सोचा है की राम के राजा बनने के पश्चात भरत को भी राज्य से निष्कासित कर दिया जाएगा और तुम भी जिंदगी भर कमरे में रोती रहोगी। 

मंथरा ने केकैयी के मन में भी संदेह का बीज प्रस्फुटित कर दिया। तब केकैयी बोली, मंथरा मेरा दिल बैठा जा रहा है अब तू ही बता कि में कया करूं और इस अनिष्ट से कैसे बचा जाए। 

मंथरा ने योजना बनाई और कहा, तुम्हें याद होगा कि राजा दशरथ शंभर नामक असुर से युद्ध के दौरान बुरी तरह घायल हो गए थे तब तुम ही रथ चलाकर युद्धभूमि से उन्हें बाहर सुरक्षित लेकर आई थी और तुम्हारी सेवा और देखभाल से ही वे स्वस्थ हो सके थे और इसके बदले में उन्होंने तुम्हे दो वर प्रदान किए थे और आज वह समय आ गया है तुम उनसे दो वर मांग लो कि भरत का राजतिलक हो और दूसरा वर यह कि राम को चौदह वर्ष का वनवास हो। चौदह साल वनवास करने के बाद राम को सारी प्रजा विस्मृत कर देगी और पूरे राज्य में भरत की जय जयकार होगी। 

केकैयी, मंथरा के बहकावे में आ गई और अपना राजसी ठाठ बाट उतारा और बालों को बिखेर मलिन वस्त्र पहने दुख की साकार मूर्ति बन कोप भवन में पहुंच गई और उदासी की बिखेरकर वह भूमि पर ही लेट गई। 

इधर दरबार में मंत्रणा समाप्त हुई राजा दशरथ कोपभवन पहुंचे जहां केकैयी को मलिन वस्त्रो में लेटे देखकर वे घबराकर कांप उठे और बोले, प्राण प्रिय, यह क्या, तुम इस हालत में कोप भवन में। किसी ने कुछ कह दिया है क्‍या या किसी ने तुम्हारा अपमान किया है। केकैयी बोली, मैं यह तभी बताऊंगी जब आप मेरी मनोकामना पूरी करने का वचन मुझे देंगे। 

मैंने भला तुम्हारी कौन सी बात टाली है केकैयी। बोलो तुम क्या चाहती हो, मैं यह वचन देता हूं कि मैं तुम्हारी प्रत्येक मनोकामना पूरी करूंगा। 

तब केकैयी बोली, तो सुनिए महाराज आपको याद होगा वर्षों पूर्व आपने मुझे दो वर दिए थे। तब मैंने वे वर नहीं मांगे थे लेकिन आज मैं आपसे वे मांगना चाहती हूं। मेरा पहला वर यह है कि भरत का राजतिलक हो और दूसरा यह कि राम को चौदह वर्ष के वनवास के लिए एक तपस्वी के वेश में भेज दिया जाए। इसे पूर्ण कर अपना वचन निभाए और इसे टालकर रघुकुल की रीत को कलंकित न करें। यदि आपने मेरा वचन तोड़ा तो दुनिया को यह पता चल जाएगा कि रघुवंशी राजा दशरथ ने वचन भंग किया है और आप सभी की नजरों से गिर जाओगे। मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती कि मेरा पुत्र दास की तरह जीवन व्यतीत करें। 

राजा दशरथ फूट-फूट कर रोने लगे उन्होंने के केकैयी को मनाने का भरसक प्रयास किया लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। राजा दशरथ समझ गए कि वह नहीं मानेगी। और वे घायल पक्षी की तरह तड़प कर रह गए। 

इधर राजतिलक की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। तब वशिष्ठ ने मंत्री सुमंत से महाराज को दरबार में ले आने को कहा। सुमंत तत्काल राजा दशरथ के पास पहुंचे। राजा दशरथ शोक की साकार प्रतिमा बने हुए सुमंत को देखते देखते मूर्छित हो गए। सुमंत एकदम से घबरा गया। तभी केकैयी पास आई और बोली, घबराइए नहीं मंत्री दरअसल महाराज रात भर सो नहीं सके और राजतिलक के बारे में ही सोचते रहे आप जाइए एवं राम को यहां भेज दीजिए। 

राम उसी समय राजा दशरथ के पास केकैयी के प्रकोष्ठ में पहुंचे एवं माता-पिता का चरण स्पर्श करके बोले आज्ञा की जय राजा दशरथ ने नम आंखों से पुत्र की ओर देखा और आंखों से अश्रु धारा बह निकली और देर तक पुत्र को देखने का साहस नहीं कर सके। तब केकैयी बोली, महाराज ने एक बार प्रसन्न होकर मुझे दो वरदान दिए थे आज मैंने वे दोनों मांग लिए तो वे पछता रहे हैं यह तो रघुकुल रीत के विपरीत है। तो तुम ही पिता की कुछ सहायता करो ताकि उन वचन उन पर वचन भंग का कलंक न लगे। मैंने जो दो वर मांगे थे उनमें पहला यह है कि भरत को राज्य मिले और दूसरा यह कि तुम्हें चोदह वर्ष का वनवास और पुत्र का एकमात्र कर्तव्य यही है कि पिता के यश के लिए उसकी वचन रक्षा के लिए स्वयं को सत्य मार्ग पर समर्पित कर दें तो बेहतर यही है कि तुम इसी समय इन वचनों को निभाओ। 

यह सुनकर राम के चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई। वे मधुर स्वर में बोले, हे माता बस इतनी सी बात है, मुझे आपका आदेश स्वीकार है, मैं तुरंत वनवास को चला जाऊंगा एवं भरत का ही राज्य तिलक होगा। इसमें पिता को दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है पिता के वचनों की पूर्ति के लिए तो मैं एक राज्य क्या तीनों लोकों के राज को त्याग सकता हूं। आप भरत को तुरंत ननिहाल से बुलाएं एवं महाराज को धर्म संकट से मुक्त करें। 

बेचारे दशरथ मूर्छित हो गए । राम ने मूर्छित पिता को संभाला एवं अभिवादन किया और प्रकोष्ठ से बाहर निकल गए। राम को इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं था कि उनके हाथों से सत्ता निकल गई उनके चेहरे पर पहले जैसी ही सौम्यता छाई हुई थी बल्कि वे तो इस बात से बहुत ही प्रसन्न थे कि उन्हें पिता के वचनों को निभाने का एक अवसर मिला है। 

राम ने कौशल्या को भरत का राजतिलक एवं स्वयं का चौदह वर्ष का वनवास के बारे में अवगत कराया। कौशल्या जो राम के राजतिलक का इंतजार कर रही थी उसके प्रसन्नता से दमकते चेहरे पर विषाद की गहरी रेखाएं छा गई। वे मूर्छित सी हो गई तब राम ने आगे बढ़ कर उन्हें संभाला। कौशल्या के अधिक मना करने के बाद भी राम अपने वचन पर अडिग रहे तब कौशल्या समझ गई कि राम को अपने पद से वितरित करना संभव नहीं है। वे नम आंखों से कांपते स्वर में बोली, जाओ पुत्र ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें मैं जानती हूं तुम अपने पद से नहीं भटक सकते तुम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकते हो। 


वनवास

अपनी माता से विदा लेकर राम सीता के प्रकोष्ठ में पहुंचे और सीता को भी अपने वनवास जाने के बारे में अवगत कराया। सीता की बड़ी-बड़ी आंखों से अश्रु की बूंदें लुढ़क पड़ी और बोली, हे आर्यपुत्र, मुझे छोड़कर आप वनवास भोगेंगे और मैं यहां महलों में सुख से रहूंगी। एक पत्नी पति के कर्म फल भुगतती है। मैं आपकी अर्धांगिनी हूं पति की पूरक। सो जो वनवास आपको मिला है वही मुझे भी मिलना चाहिए। आप अकेले वनवास नहीं जाएंगे मैं आपके साथ चलूंगी। महल के सुख आपके वियोग से मैं मेरे लिए व्यर्थ हैं। 

राम व सीता व वल्कल वस्त्र पहने वनवास के लिए जाने को उद्यत हुए तो लक्ष्मण से नहीं रहा गया और वह राम व सीता के चरणों में गिर पड़े और रो-रो कर बोले, मुझे किसके सहारे छोड़ कर जा रहे हैं आप लोग मैं आपको अकेले नहीं जाने दूंगा। कृपया मुझे भी साथ चलने को अनुमति दीजिए। राम ने लक्ष्मण से को काफी समझाया लेकिन लक्ष्मण नहीं माने और उन्होंने लक्ष्मण को भी अपने साथ आने की आज्ञा दी। फिर महाराज से अंतिम विदाइ लेने तीनों अपने महल से निकलकर राजमहल की ओर चल पड़े। 

दशरथ बोले, पुत्र मैं लाचार हूं ना चाहते हुए भी तुम्हें वन भेजने को विवश हूं। मैं तो इस वचन में बंधा हूं तुम नहीं। तुम चाहो तो यह वचन तोड़कर यही रह सकते हो। राम बोले, ऐसा ना कहिए पिताश्री। माता पिता की आज्ञा मानना ही मेरा प्रथम कर्तव्य है। तीनों ने वल्कल वस्त्र धारण किए। सभी का अभिवादन किया और वहां से बाहर निकल आए। रथ तैयार खड़ा था। राम, सीता व लक्ष्मण रथ पर सवार हुए तो अयोध्या के नर नारी बच्ची बूढ़े सभी रथ के पीछे दौड़ पड़े। राजा दशरथ भी रथ के पीछे जाने को उद्धत हुए लेकिन थोड़ी ही देर में रथ आंखों से ओझल हो गया और पीछे रह गई सिर्फ उड़ती हुई धूल। 

कोशल प्रदेश की सीमा आ गई। राम रथ से उतरे और हाथ जोड़कर कोशल राज्य की सीमा पर से राज्य से विदाई ली। तत्पश्चात वे पुन: रथ पर सवार हुए और अगस्त्य मुनि के आश्रम को पार करते हुए गंगा नदी के किनारे आ पहुंचे। गंगा तट के इस प्रदेश का राजा निषादराज गुह था, उसे जब यह सूचना मिली की राम ने गंगा तट पर डेरा डाला है तो वे अपने परिवार, मंत्रीगण एवं संबंधियों के साथ उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचे। वह रात्रि तीनों ने उसी तट पर गुजारी निषादराज एवं सुमंत भी उन्हीं के साथ थे। प्रात: काल राम ने निषादराज से अंतिम विदाई ली। निषादराज के कर्मचारियों ने एक सुंदर सी नाव तैयार की। राम, सीता व लक्ष्मण नाव में सवार होने लगे और राम ने कहा, हे सुमंत, आपका काम समाप्त हुआ आर्य, अब आप अयोध्या लौट जाइए। नदी पार करके हम पैदल ही आगे की यात्रा करेंगे। राजमहल पहुंचकर माताओं के चरणों में हमारी वंदना पहुंचाएं और उन्हें बता दें कि वनवास में हम जरा भी दुखी नहीं हैं। सुमंत को आंखों से आंसुओं की झड़ी बह निकली। तीनों ने नौका से गंगा की स्तुति करते हुए इसे पार किया। 

राजमहल से सभी जा चुके थे। कौशल्या वही महाराज दशरथ के पास बैठी हुई थी तभी आधी रात को अचानक उनकी आंखें खुल गई और वे फिर राम को याद करने लगे तब उन्हें दुख पूर्वक कौशल्या से बोले, मानव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। सच तो यह है कि एक बार युवावस्था में अनजाने में मैंने वृद्ध मां बाप के एकमात्र पुत्र श्रवण कुमार को बाण से मार डाला था। इसीलिए मुझे भी पुत्र वियोग मिला है। मुझे मौत की पग ध्वनियां साफ सुनाई दे रही हैं, मेरा हृदय बैठा जा रहा है, आंखों के सामने अंधेरा छा रहा है, हे राम, हे लक्ष्मण, हे सीते, कहां हो, हे राम, हे राम। 

इतना कहते-कहते उनकी धड़कन रुक गई, सांस के तार टूट गए, पुत्र वियोग से शोकाकुल राजा दशरथ के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराज के देहांत की खबर पलक झपकते ही पूरे अयोध्या में फैल गई चारों और शोक का वातावरण छा गया। तीनों माताएं कौशल्या एवं सुमित्रा एवं अन्य रानियां छाती पीट-पीटकर रुदन कर रही थी। अयोध्या पर यह दौहरा आघात था। सारी नगरी उजाड़ हो गई थी। 


भरत तपस्वी

तब वशिष्ठ मुनि के आज्ञानुसार अगले दिन दरबार में मंत्री व राजपुरुष एकत्र हुए एवं महाराज दशरथ के अंतिम घोषणानुसार वशिष्ठ मुनि ने भरत को केकैयी प्रदेश से बुलाने की बात कही। भरत एवं शत्रुघ्न अपने ननिहाल केकैयी देश से विदा ली एवं दुर्गम रास्तों को पार करते हुए आठवें दिन अयोध्या पहुंचे। 

भरत बहुत घबराए और रथ से उतरे और तेजी से माता केकैयी के पास पहुंचे। भरत को देखते ही केकैयी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई वह खुश हो उठी और पुत्र को आलिंगन में ले कर बोली, पुत्र अब मैं बहुत खुश हूं। यहां सब कुशल मंगल है तुम चिंता ना करो। भरत ने पूछा, लेकिन माता हुआ क्या है। यहां तो मुझे सभी जगह उदासी दिखाई दे रही है। केकैयी बोली, बेटा तुम्हारे परम यशस्वी पिता हमें छोड़ कर परमधाम चले गए हैं। सुनकर भरत को बहुत आघात लगा। उससे रहा नहीं गया और वह फूट-फूट कर रोने लगे। 

केकैयी बोली, पुत्र व्यर्थ इतना शौक मत करो। केकैयी एक पल के लिए तो खामोश रही लेकिन फिर उसने भरत को अपने वरों के बारे में एवं उनके वनवास जाने का कारण बता दिया और यह भी कहा कि अब राजगद्दी पर भरत ही शासन करेंगे। भरत का सारा शरीर क्रोध से कांपने लगा वह तेज स्वर में बोले, मां तुमने तो हमारे वंश को ही कलंकित कर दिया। नि:संदेह तुम्हारे कारण ही महाराज का निधन हुआ। सोचो तो माता कौशल्या और सुमित्रा भी पुत्र वियोग में कितनी तड़प रही होंगी। आज तुम्हारे कारण मैं अनाथ हो गया मां। मुझे ऐसा राज्य और सत्ता नहीं चाहिए। मैं राम व लक्ष्मण को वापस ले आऊंगा और उन्हें ही सिंहासन पर बिठाऊंगा। मैं चला। 

तब सभी विशिष्ट मंत्रीगण भरत के पास पहुंचे। भरत बोले, क्षमा करें मैं सिंहासन पर नहीं बैठ सकता। मैं वन जाकर राम को वापस ले आऊंगा और वे ही कोशल के सिंहासन पर बैठने के अधिकारी हैं। कृपया मेरे जाने का प्रबंध करें। मैं चतुरंगिनी सेना के साथ यथाशीघ्र यहां से प्रस्थान करना चाहता हूं। 

बस फिर क्या था सभी भरत के जाने की व्यवस्था में लग गए और भरत रथ पर सवार होकर निकल पड़े। उनके साथ न सिर्फ चतुरंगिनी सेना थी, बल्कि समस्त मंत्रीगण, तीनों माताएं और अनेक नगर निवासी भी थे। निषादराज को जब यह सूचना मिली कि भरत राम को वापस लेने आए हैं ताकि वह राज की गद्दी संभाल सके एवं जलक जन कल्याण करें तो निषादराज ने सैकड़ों छोटी-छोटी नौकाओं से भरत की सेना एवं लोगों उसके साथ आए लोगों को गंगा के उस पार पहुंचा दिया। राम ने चित्रकूट में अपना वनवास काट रहे थे। भरत जैसे ही राम से मिले तो उनके चरणों पर फूट-फूटकर रोए एवं पिता की मृत्यु का समाचार सुनाया। राम अत्यंत दुखी हुए। 

भरत बोले मुझे ऐसा राजपाट नहीं चाहिए भैया उस पर आपका अधिकार है। अयोध्या चलकर सिंहासन संभालिए। राम बोले मैंने पिता के आदेश से वन गमन किया है एवं उनके वचन को पूरा करना ही मेरा धर्म है। मैं वचन तोड़कर उनकी आत्मा को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहता। भरत की काफी कोशिशों के बावजूद भी राम अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुए। तब भरत सभी के साथ राम की चरण पादुका लेकर चित्रकूट से विदा हो गए। भरत ने अयोध्या पहुंचकर सिंहासन पर राम की चरण पादुकाओं को प्रतिष्ठित कर दिया और परिवार का उत्तरदायित्व शत्रुघ्न को सौंप दिया और स्वयं राम की तरह तपस्वियों का बाना धारण कर लिया। भरत ने यह प्रण लिया कि राम वापस जब तक अयोध्या में नहीं आएंगे तब तक वे इसी प्रकार रहेंगे। 


पंचवटी

भरत से मिलने के बाद राम ने चित्रकूट से अपना डेरा उठाया और लक्ष्मण एवं सीता के साथ महावन में प्रवेश कर गए। दंडकारण्य पहुंचते हुए वहां विराज राक्षस का वध किया। इस प्रकार अपनी इस वनवास यात्रा के दौरान उन्होंने कई राक्षसों का वध किया एवं ऋषि-मुनियों को उनके आतंक से बचाया। इस तरह राम को वनवास भोगते हुए लगभग 10 साल हो चुके थे। हरी भरी राहों से होते हुए राम, सीता और लक्ष्मण पंचवटी की ओर चल दिए। लेकिन अचानक रास्ते में उन्हें एक विशाल पक्षी दिखाई दिया। तब पक्षी ने हाथ जोड़कर कहा, जब से सुना है आप दंडकारण्य पधारे हैं। तब से आपके दर्शनों के लिए भटक रहा हूं। मैं जटायु हूं राम, तुम्हारे पिता का मित्र सो मुझे भी अपना ही मित्र मानो और मुझे भी अपने साथ रहने की अनुमति दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा। राम ने जटायु की याचना स्वीकार ली और पंचवटी की राह पकड़ ली पंचवटी सचमुच बहुत ही रमणीक स्थल था। राम को यह स्थान बहुत भाया लक्ष्मण ने यहां बहुत अच्छी सी कुटिया बना डाली और तीनों ने हवन कर कुटिया में प्रवेश किया। अब पंचवटी में स्थिति यही कुटिया उन तीनों का घर थी लक्ष्मण बड़े भाई व भाभी की तन मन से सेवा करने लगे। 

हेमंत ऋतु थी एक दिन दोनों भाई गोदावरी नदी से नहा कर वापस लौटे। तभी आश्रम के पास एक राक्षसी आ पहुंची। यह राक्षस राज रावण की बहन सूर्पनखा थी। जैसे ही उसने राम को देखा वह उसके रूप पर मोहित हो गई और राम के समक्ष विवाह प्रस्ताव रखा और राम द्वारा मना करने पर अपना विकराल रूप धारण कर सीता की ओर लपकी। भला यह लक्ष्मण कैसे बर्दाश्त करते राम का आदेश पाते ही उन्होंने तलवार निकाली और शूर्पणखा की नाक कान काट दिए। सूर्पनखा पीड़ा के मारे झटपटाती हुई वहां से भाग निकली और अपने भाई खर के पास पहुंची। खर को यह बिल्कुल नहीं भाया और स्वयं रथ पर सवार होकर राम से लोहा लेने चल दिया और साथ में भाई दूषण और राक्षस सेना को भी लेता गया। आश्रम के निकट पहुंचते ही खर व उसकी सेना राम बाण छोड़ने लगे। तब राम को क्रोध आया और उन्होंने ताबड़तोड़ बाण छोड़ना शुरू कर दिया देखते ही देखते अनगिनत राक्षस जमीन पर आ पड़े और पलक झपकते ही सारा क्षेत्र राक्षसों की लाशों से पट गया। इस प्रकार इस भयंकर युद्ध में राम ने दूषण के दोनों हाथ काट दिए और अंत में सिर्फ खर बचा जिसे भी राम ने आगस्त मुनि द्वारा प्राप्त अस्त्र से मार डाला। 

इस युद्ध में अकंपन नामक राक्षस बच गया जो सीधा लंका नरेश रावण के पास पहुंचकर उन्हें सारा वृत्तांत कह सुनाया और राम की वीरता एवं शक्ति की तारीफ की। ऐसे में रावण के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। तब अकंपन ने रावण को एक उपाय सुझाया उसने कहा, राम की पत्नी सीता अत्यंत रूपवती है और राम उसे बहुत चाहते हैं। अगर आप सीता को हर लाए तो राम उसके वियोग में घुट घुट कर मर जाएगा और आपको जहमत उठाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। यह उपाय रावण को भा गया और वह अपने दिव्य रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से सागर पार कर मारीच राक्षस के पास जा पहुंचा। यह वही मारीच था जिसे राम ने कभी विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते समय ऐसा तीर मारा था कि वह आघात होकर यहां आकर गिर गया था। 


स्वर्ण मृग

रावण मारीच को दंडकारण्य ले गया और एक उपाय सुझाया। मारीच ने रावण के कहे अनुसार स्वर्ण मृग का रूप धरा और राम के आश्रम के पास जा पहुंचा। जब सीता की नजर उस पर पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गई। उसने राम से कहा, स्वामी देखो कितना प्यारा मृग है। मैं इसे पालना चाहती हूं आप इसे पकड़ कर लाइए। इसे हम बाद में महलों में ले चलेंगे और अगर यह जीवित न पकड़ा जाए तो इसे मार कर इसकी छाला ही ले आइए। 

पहले तो राम ने सीता को समझाया पर सीता स्वर्ण मार्ग पाने को कटिबद्ध थी तब राम लक्ष्मण से बोले, मैं यह मृग पकड़ने जा रहा हूं। हो सकता है यह किसी राक्षस द्वारा हमें फंसाने की चाल हो अगर यह मायावी हुआ तो मारा जाएगा परंतु पीछे से तुम यहां रहकर सीता की रक्षा करना। 

ऐसा कहकर राम वहां से निकल चले। मायावी मृग कूदता फांदता हुआ भाग रहा था कभी नजर आता तो फिर कभी लुप्त हो जाता। अंत में राम ने उस पर तीर छोड़ दिया जो मृग की छाती पर जा लगा। बाण लगते ही वह असली रूप में आ गया और झटपटाता हुआ मारीच जोर से हे लक्ष्मण, हे सीते पुकार कर मर गया। राम देखते ही समझ गए और कि यह राक्षसों की चाल है और दोबारा कुटिया की ओर दौड़े। इधर हे लक्ष्मण, हे सीते सुनते ही सीता ने सोचा कि राम संकट में फंस गए हैं तो उन्होंने लक्ष्मण को शीघ्र भाई की सहायता करने के लिए भेजा। लक्ष्मण ने पहले तो सीता को समझाया कि हो सकता है यह किसी राक्षस की चाल हो परंतु सीता के अधिक कहने पर लक्ष्मण ने अपना धनुष बाण संभाला और कुटिया से चल दिए। 


सीता हरण

लेकिन जाने से पहले लक्ष्मण ने कुटिया के चारों और तीर से सीमा रेखा अंकित कर दी और सीता से कहा कि इस रेखा से बाहर बाहर ना निकले अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। रावण पास ही छिपा हुआ यह सब देख रहा था। लक्ष्मण के आश्रम से दूर जाते ही उसने एक साधु का वेश धारण किया किंतु लक्ष्मण की सीमा रेखा पार नहीं कर सका। तो उसने दूर से ही आश्रम के पास पहुंचकर गुहार लगाई। इस पर सीता बाहर आई और उसने सोचा कि साधु से कैसा डर। वह भिक्षा देने के लिए सीमा रेखा से बाहर निकल आई और बाहर आते ही रावण वास्तविक रूप में प्रकट हो गया। यह देखकर सीता घबरा गई और रावण जोर-जोर से हंसते हुए उसने सीता को उठा लिया और अपने रथ पर उसे बिठाकर आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चला। रावण अट्टहास करता हुआ जा रहा था। तभी जटायु ने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा तो वह क्रोधित हो गया और सीता को बचाने रावण के पास जा पहुंचा। जटायु का बीच में कूदना रावण को भाया नहीं और रावण और जटायु में आकाश में घमासान युद्ध छिड़ गया। परंतु जटायु बूढ़ा और अशक्त था रावण ने तीव्र प्रहार कर उसके पंख काट दिए और वह तड़पता हुआ जमीन पर आ गिरा। बस उसकी सांसें बची हुई थी। रावण का विमान लंका की ओर उड़े जा रहा था। 

इस प्रकार रावण वन, प्रांत, नदी- नालों, पर्वतों और सागर को पार करता हुआ लंका जा पहुंचा और सीता को अपने महल में ले गया। सीता सो रही थी तब रावण पास आकर बोला, मैं चाहूं तो तुम्हें जोर-जबर्दस्ती से भी हासिल कर सकता हूं किंतु मैं तुम्हें एक वर्ष देता हूं। अगर तुमने मुझे स्वीकार नहीं किया तो मैं तुम्हें जिंदा नहीं छोडूंगा। इतना कहकर रावण ने राक्षसियों से कहा कि इसे अशोक वाटिका में ले जाओ। सभी राक्षसियां सीता को अशोक वाटिका में ले गई। 


सीता की खोज

इधर मारीच का वध करके राम कुटिया की ओर आए। रास्ते में लक्ष्मण से मिले तो लक्ष्मण ने उन्हें सारा मामला समझाया। दोनों जैसे ही कुटिया पहुंचे तो कुटिया खाली थी। सीता का दूर-दूर तक पता नहीं था। राम की आंखों के आगे अंधेरा छा गया वे घबरा गए उन्हें कुछ समझ नहीं आया कि पल भर में सीता कहां लापता हो गई। लक्ष्मण भी परेशान हो उठे। उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई और सीता को आवाज लगाई परंतु कहीं भी सीता का नामोनिशान नहीं था। राम की आंखें नम हो गई और वे परेशान हो गए तब लक्ष्मण ने उन्हें सांत्वना दी और सीता को खोजने का सुझाव दिया। मार्ग में खोजते खोजते उन्हें जटायु मिल गया जोकि राम की प्रतीक्षा कर रहा था उसने बताया कि रावण सीता का हरण कर ले गया है। मैंने उन्हें छुड़ाने का बहुत प्रयास किया किंतु मुकाबला नहीं कर सका। ऐसा कहकर जटायु ने दम तोड़ दिया। राम ने वीर जटायु का अभिवादन कर यथाविधि अंतिम संस्कार किया और लंका की ओर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। खोजते खोजते वे दोनों वन में काफी आगे दूर दक्षिण दिशा की ओर निकल आए चारों ओर अंधकार था तभी एक बहुत ही भयानक राक्षस ने दोनों भाई को पंजों में दबा लिया। राम ने तलवार से एक ही बार में उसके दोनों हाथ काट डाले और वह तड़पता हुआ जमीन पर आ पड़ा। मरते मरते राक्षस बोला, हे राम, मैं कबंध हूं। मैंने बहुत पाप किए थे। आज मैं तुम्हारे हाथों से पाप मुक्त हो गया हूं। मैं तुम्हें सीता का उद्धार का उपाय बताता हूं। तुम यहां से सीधा ऋश्यमूक पर्वत चले जाओ वहां पंपापुर नामक नगर है वहीं वानर राज सुग्रीव अपने बहादुर वानरों के साथ रहते हैं। उनकी सेना रावण की सेना से भिड़ने में पूरी तरह समर्थ है। सुग्रीव को उसके भाई बालि ने उसका राज्य हड़प कर उसे घर से भगा दिया है वह भी तुम्हारे जैसे मित्र की तलाश में है। तुम उनकी सहायता करो वह तुम्हारी करेगा। राम ने लक्ष्मण के साथ पंपापुर की राह पकड़ी। 


किष्किंधा 

ऋश्यमूक पर्वत पर सुग्रीव अपने बचे कुचे वीर मंत्री वानरों व परमवीर मंत्री प्रमुख हनुमान के साथ रहते थे। बालि ने उसकी बीवी और राज्य छीन कर घर से निकाल दिया था अब सुग्रीव को डर था कि कहीं वह मौका पाकर उसकी जान भी न लेले। उस दिन सुग्रीव ने देखा कि दो परम तेजस्वी बलिष्ट धनुर्धारी इधर ही चले आ रहे हैं। उसे शक हुआ कि कहीं बालि ने ही तो इन्हें मुझे मारने नहीं भेजा। तब उसने हनुमान को उनके पास भेजा। 

सुग्रीव के आदेश से हनुमान ब्राह्मण भिक्षुक के रूप में पर्वत से नीचे उतर आए और राम के पास पहुंचकर विनीत भाव से बोले, हे राजन आप लोग कौन हैं, मैं सुग्रीव का दूत हूं जो इस क्षेत्र के स्वामी हैं। उन्होंने आपका परिचय जानना चाहा है। मेरा नाम हनुमान है सुग्रीव अपने भाई से सताया हुआ है और भागकर यहां आश्रय लिया है। वह आपकी मित्रता चाहता है। लक्ष्मण ने हनुमान को बताया। ‘यह श्रीराम और मैं इनका अनुज लक्ष्मण। हम चौदह वर्ष का वनवास भोगते हुए भटक रहे हैं। हमारे साथ रामप्रिय सीता भी थी किंतु उन्हें रावण हर ले गया। हमें सुग्रीव की मित्रता स्वीकार है। और राम लक्ष्मण को साथ लेकर हनुमान ऋश्यमूक पर्वत की ओर चल पड़े। यहां आकर राम एवं सुग्रीव की आपस में मुलाकात हुई और दोनों ने ही अपनी दु:खद कहानी एक दूसरे को सुनाई। दोनों ने एक दूसरे की सहायता करने का वचन लिया। 

इसके बाद राम ने सुग्रीव को बालि को हराने की एक योजना बताई और राम के साथ सभी किष्किंधा की ओर चल पड़े। किष्किंधा के पास ही वे एक ऐसे स्थल पर पहुंचे जहां वृक्षों के झुंड थे राम सभी के साथ वृक्षों की ओट में छिप गए और सुग्रीव के गले में उन्होंने एक माला डाल दी ताकि वह पहचान सके कि सुग्रीव कौन है और बालि कौन। सुग्रीव ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा और दोनों एक दूसरे से टकरा गए। राम ने देर करना उचित नहीं समझा और धनुष उठाया और तीर छोड़ दिया जो बाली के वक्षस्थल में जाकर लगा। बालि धरती पर गिरकर अचेत हो गया और उसने दम तोड़ दिया। सभी को बालि की मृत्यु का अत्यंत दुख हुआ। सुग्रीव की आंखें भर आई और बालि की पत्नी तारा भी विलाप करने लगी। इसके बाद बालि का विधिवत सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार किया गया और सुग्रीव को किष्किंधापुरी का सह सम्मान राजा बनाया गया और बालि के पुत्र अंगद को युवराज। 


वीर हनुमान 

सीता की याद बार-बार राम को घेरकर व्याकुल कर देती थी। वर्षा ऋतु खत्म हो गई। हनुमान ने सुग्रीव के पास जाकर उसे अपने कर्तव्य एवं वचन की याद दिलाई। सुग्रीव ने भी हनुमान को यह विश्वास दिलाया कि वह अपने वचन को भूला नहीं है। तब सुग्रीव ने अपनी पूरी सेना के साथ राम के द्वार पर जाने का निश्चय लिया। राम के पास पहुंचकर सुग्रीव ने हाथ जोड़कर विनती की। हे प्रभु मैं सारी तैयारियां करके आया हूं अब सीता माता की खोज का काम शुरू होने में विलंब हम बिल्कुल नहीं करेंगे। 

राम आगे बढ़े और सुग्रीव को आलिंगन में लिया और धन्यवाद दिया। राम ने एक अंगूठी हनुमान को देते हुए कहा, सुनो कपीस, यह अंगूठी में मेरा नाम अंकित है अगर तुम्हें कहीं सीता मिल जाए तो उसे पहचान के लिए अंगूठी दे देना ताकि उसे तुम पर कोई शक ना हो। हनुमान ने अंगूठे ली और श्रीराम के चरण छूकर व सुग्रीव से विदा लेकर सीता की खोज में वहां से प्रस्थान कर गए। 

पूरी वानर सेना सीता के अनुसंधान में जुट गई। विश्वास था कि अवश्य ही सीता को खोज लिया जाएगा किंतु सीता अभी तक किसी को भी नहीं मिल पाई। सभी दक्षिणावर्ती समुद्र तट पर आ पहुंचे। अब तक का सारा प्रयास व्यर्थ गया था। तभी सभी की नजर एक बूढ़े गिद्ध की ओर गई जो वही रहता था। वह बोला, हे वानरों, मैंने तुम्हारे मुख से रावण का नाम सुना। रावण ने बड़ी निर्ममता से मेरे भाई जटायु को मार डाला था और मैं अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था किंतु बहुत बूढ़ा होने के कारण मैं रावण से लड़ने में असमर्थ हूं। मैं तुम्हारी मदद अवश्य करूंगा। सुनो रावण इसी मार्ग से एक रूपवती नारी को हर ले गया था जो बार-बार बड़ी करुणा से हे राम हे लक्ष्मण पुकार रही थी। नि:संदेह वे माता सीता ही होंगी और वह कहीं और नहीं लंका में ही है जो यहां से चार सौ कोस दूर समुद्र के पास स्थित है। वहीं राक्षसराज रावण का राज्य है बस किसी तरह समुद्र को पार कर सीता का पता लगाया जा सकता है। 

यह सुन सभी बहुत प्रसन्न हुए सीता का तब तक पता चल चुका था। किंतु दूर-दूर तक फैले इस विशाल असीम सागर को कैसे बाहर किया जाए यही एक सवाल था। इस सागर को पार करने की हिम्मत पूरी वानर सेना में किसी की नहीं हो पा रही थी। तब हनुमान ने सागर पार करने की ठानी और देखते ही देखते हनुमान का आकार वृहद हो गया और वे एक विशाल रूप में आ गए और सागर के किनारे जा पहुंचे। हनुमान बोले, बंधुओं, मैं यह एक समुद्र तो क्या ऐसे अनंत समुद्रों को लांग सकता हूं। तुम चिंता मत करो मैं सीता माता को खोजकर ही दम लूंगा। 

हनुमान विदा लेकर एक भव्य उछाल भरी और समुद्र के ऊपर से उड़ चले। उन्हें दूर अनेक नदियां तट से गिरती हुई समुद्र में दिखाई दी, जहां पर घने वृक्षों की कतारें फैली हुई थी। हनुमान समझ गए कि यहीं लंका है जहां सोने के महल हैं। हनुमान तट के किनारे नीचे उतरे और एक शिखर पर चढ़कर उन्होंने सोने की लंका को देखा जो सचमुच इंद्रपुरी के समान सुशोभित थी। परंतु अभी उन्हें यह नहीं पता था कि सीता माता को कहां दूंढा जाए। हनुमान जानते थे कि सहज मार्ग से नगर में प्रवेश करना मुश्किल है और वे भी नहीं चाहते थे कि किसी भी राक्षस को उनके आगमन का जरा भी संदेह हो। तब उन्होंने चालाकी से अपना आकार छोटा कर लिया और सीधा लंका की दीवार फांद कर नगर में प्रवेश किया। हनुमान सीता की खोज में इधर-उधर भटकने लगे, अनेक बाग बगीचों में सीता को ढूंढ़ा किंतु सीता कहीं नजर नहीं आई। आखिरकार हनुमान की तपस्या रंग लाई और खोजते खोजते अशोक वाटिका में दाखिल हो गए। वाटिका बहुत ही सुंदर थी। चारों और वृक्षों की कतारें थी, नाना प्रकार के पक्षियों से वाटिका गुंजन हो रही थी। रंग-बिरंगे फूलों की महक आ रही थी। यहीं पर सीता कैद थी। हनुमान ने चारों ओर नजर घुमाई और अंत में उन्हें एक वृक्ष के नीचे चबूतरे पर उदास व मलिन एक स्त्री देखी। जिसके चारों और राक्षसियां मुस्तैदी से खड़ी थी। ऐसा लग रहा था कि उसने कई दिनों से अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डाला है। चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएं थी। वह इस सुंदर अशोक वाटिका में जरा भी खुश नहीं थी। हनुमान ने सोचा नि:संदेह यह सीता ही हो सकती हैं और कोई नहीं। इतनी सुंदर और शोकाकुल नारी का इस रमणीक स्थान में सीता के अलावा और कौन हो सकता है। 

मौका देखकर हनुमान नीचे झुके और वृक्ष के पास आकर सीता को संबोधित करके मृदु स्वर में राम और उनके वंश का गुणगान करते हुए बोले, हे सीता माता। मैं राम का दूत हूं वे आपको खोजते खोजते वानर राज सुग्रीव के पास पहुंचे हैं। हम उन्हीं की आज्ञा से आपको खोजते फिर रहे थे तब मुझे जटायु के भाई ने आपका पता दिया। मैं अथाह समुद्र को लांघते हुए लंकापुरी पहुंचा हूं। इस विकट स्थान में राक्षसियों के पीड़ादायक सख्त पहरे में रावण के आतंक को सहते हुए सीता ने जब ये वचन सुने तो लगा जैसे कानों में अमृत घुल गया हो। सीता को वृक्ष पर बैठे हनुमान दिखाई दिए। सीता बोली, तुम्हारा संदेश सही है वानर। मैं राम की सीता ही हूं और रावण मुझे यहां जबरदस्ती उठा लाया है। पर तुम कौन हो, कहीं तुम कोई मायावी तो नहीं। क्योंकि इससे पहले भी मायावी मृग द्वारा मुझे धोखा मिल चुका है। 

सीता को विश्वास दिलाने के लिए हनुमान ने वह अंगूठी सीता को दिखाते हुए कहा, हे माता यह देखिए मुद्रिका इस पर श्रीराम का नाम अंकित है। चलते समय राम ने ही मुझे यह दी थी ताकि आपको दिखाकर विश्वास दिला सकूं कि मैं राम का ही दूत हूं। सीता ने अंगूठी क्या देखी साक्षात राम के दर्शन कर लिए और हर्ष और आनंद से सीता के हृदय का मयूर नाच उठा। पल भर में ही सीता के चेहरे से मायूसी की छाया दूर हो गई अब उन्हें हनुमान पर कोई संदेह नहीं रहा। 

हे पवनपुत्र, अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि तुम्हे राम ने ही मेरे पास भेजा है। तब सीता ने अपनी चूड़ामणि हनुमान को सौंपते हुए बोली, यह लो पवन पुत्र, यह मेरी निशानी राम को दे देना। इसे देखकर राम तुरंत समझ जाएंगे कि तुम मुझसे मिल चुके हो। उनसे कहना कि सीता के अपमान का बदला जल्दी आ कर ले। हनुमान बोले ऐसा ही होगा माता। फिर हनुमान विदा हुए। 


लंका दहन

लंका से निकलने से पहले हनुमान ने सोचा जरा लंका की सामरिक स्थिति भी समझ लेनी चाहिए और रावण की सेना एवं उनके अस्त्र-शस्त्र के भंडार के बारे में भी जानकारी ले लेनी चाहिए। फिर क्या, हनुमान ने अशोक वाटिका में तहस-नहस करना शुरू किया। अशोक वाटिका के बड़े बड़े पेड़ों को झकझोर कर भूमिसाध कर दिया। तभी बहुत से राक्षस आकर रावण हनुमान की ओर लपक पड़े हनुमान ने एक-एक कर सभी को मौत के घाट उतार दिया पहले हनुमान जम्बुमाली को मारा और इसके बाद रावण पुत्र अक्षय कुमार का भी वध कर दिया। तब जाकर मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्र से हनुमान को बांध लिया और रावण के समक्ष प्रस्तुत किया। 

रावण गरज कर बोला, अरे वानर तू कौन है किसने भेजा है तुझे और अशोक वाटिका में तूने सीता से क्‍या बातें की। हनुमान बोले , लंकेश मैं किष्किंधा के राजा सुग्रीव का दूत हनुमान हूं। `आप इतने विद्वान और नीतिवान हैं उसके बाद भी आपने पर नारी का अपहरण करके उचित नहीं किया ऐसा करके आपने अपनी मौत स्वयं आमंत्रित की है। अभी भी उचित समय है आप सीता से क्षमा मांग कर उन्हें मुक्त कर दे। राम का हृदय विशाल है वह आपको क्षमा कर देंगे नहीं तो आपकी भी वही दशा होगी जो खर व दूषण आदि की हो चुकी है। 

रावण को क्रोध के मारे थरथर कांप उठा और उसने राक्षकों को हनुमान के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके फेंक देने का आदेश दिया। तभी वहां दरबार में विभीषण बैठा था जो रावण का छोटा भाई था। बोला, हे राजन, इस वानर ने पहले ही बता दिया है कि वह राजा सुग्रीव का दूत है अत: दूत को मारना राजनीति के नियम अनुसार अधर्म है इससे आपकी चारों ओर बदनामी होगी। 

रावण ने सोचा फिर बोला, ठीक है विभीषण, मैं इसकी जान नहीं लूंगा लेकिन इसके किए की सजा अवश्य दूंगा। इस वानर की पूंछ में आग लगा दो जब यह जली हुई पूछ लेकर किष्किंधा पहुंचेगा तो इसका खूब मजाक उड़ेगा और यह आजीवन अपने इस कुकृत्य को याद कर पछताएगा। 

आदेश सुनते ही सैनिकों ने हनुमान की पूंछ पकड़ी और उस पर तेल लगाकर आग जला दी। हनुमान पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने इसका फायदा उठाकर जलती हुई पूंछ को हवा में लहरा कर सैनिकों पर कड़े प्रहार किए और कई राक्षस मारे गए। जो लोग हंस रहे थे उन सभी में आतंक फैल गया। इतने में भी हनुमान को संतोष नहीं हुआ उन्होंने अब लंका को जलाना आरंभ किया और लंका धू-धू कर जलने लगी। इसके बाद हनुमान सीता माता के पास अशोक वाटिका पहुंचे और उन्होंने हाथ जोड़कर उनसे जाने की आज्ञा मांगी और हनुमान लंका से प्रस्थान करने करते हुए बाहर निकल गए और सागर पार करते समय उन्होंने अपनी पूंछ की आग बुझा ली। 

सागर पार कर तट पर जैसे ही सभी को यह पता चला कि सीता माता मिल गई है सभी ने हनुमान को फूल मालाओं से उनका स्वागत किया और किष्किंधा पुरी की ओर प्रस्थान किया। वहां पहुंचकर हनुमान ने सारा वृत्तांत सुनाया एवं राम को सीता की चूडामणि दी। राम सीता को दुर्दशा सुनकर कराह उठे उनकी आंखों से आंसू की बूंदें छलक पड़ी। वे एक टक सीता की चूड़ामणि को निहारते रहे। वह बोले, हे सुग्रीव तुम यथाशीघ्र अपनी तैयारियां शुरू करो हमें लंका कि और प्रस्थान करना है। मैं सारी लंका को धूमिल कर दुंगा। 


लंका पर आक्रमण 

लंका पर आक्रमण करने की तैयारियां शुरू हो चुकी थी। समस्त वीर वानर अपनी- अपनी गुफाओं से बाहर युद्ध में हिस्सा लेने आ चुके थे। एक दिन वानर सेना राम सहित सागर तट पर आ पहुंचे। परंतु अब समस्या यह थी कि सागर को कैसे पार किया जाए। 

इधर लंका में रावण के क्रोध का अंत नहीं था। एक बंदर उनकी उसकी लंका को आग के हवाले करके भाग चुका था। यह बात रावण बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उसने दरबार में अपने सभी प्रमुख मंत्रियों के सैन्य अधिकारियों को बुलवाया और कहा, हमें किसी भी प्रकार से अपमान का बदला लेना है और इस बार यदि कोई भी वानर या अन्य कोई इस लंका में प्रवेश करें उसे मौत के घाट उतार दो। तब विभीषण रावण के आगे हाथ जोड़कर बोला, हे लंकेश मैं तो कहूंगा जो कुछ करें सोच समझ कर करें एक ही वानर ने लंका की जो दुर्गति बना दी उससे हमें सबक हासिल करना चाहिए। सीता को वापस भेज दीजिए वरना राम की सेना लंका को तहस-नहस कर देगी। 

विभीषण की बातें सुनकर रावण का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और उसने सभी के सामने विभीषण का अपमान किया और उसे लंका से निकल जाने का आदेश दिया। विभीषण अपने आसन से उठा और अपने चार मंत्रियों सहित दरबार से बाहर निकल गया। अंतत: वह सागर पार कर सीधे वहां पहुंचा जहां राम अपनी सेना सहित डेरा डाले हुए थे। यहां विभीषण राम से मिला और अपना परिचय दिया। हे राम मेरा नाम विभीषण है और मैं लंका नरेश रावण का छोटा भाई हूं। और सारा वृतांत सुनाया। राम ने बढ़कर प्रसन्नता से विभीषण को आलिंगन में लिया और उसे भरोसा दिलाते हुए कहा, लंका के आगामी नरेश आपको बनाएंगे। 

तब सभी ने विशाल सागर को पार करने की योजना बनाई। नल व नील ने वानर सेना के साथ पत्थरों पर श्रीराम का नाम लिखकर सागर पर डाला और देखते ही देखते कुछ ही दिनों में सौ योजन लंबा पुल बनकर तैयार हो गया। सुग्रीव की सेना राम के नेतृत्व में लंका की ओर अभिमुख हुई और सागर के पार पहुंच कर राम ने अपना शिविर डाल दिया। 

राम जानते थे कि इस युद्ध में लंका वासियों को भी काफी हानि होने वाली है इसलिए उन्होंने एक बार और प्रयत्न कर अंगद को रावण के दरबार में शांति दूत बनाकर भेजा। अंगद रावण के सामने जाकर बोला, हे लंकेश मैं अंगद बालि का पुत्र हूं और तुम्हारे भले के लिए श्रीराम ने कहा है कि सीता को आज ही मुक्त कर दो वरना कल का सूरज उगते हैं तुम और तुम्हारा वंश यमलोक भेज दिए जाओगे। उन्होंने तुम्हें आखिरी मौका दिया है। 

रावण भला यह क्यों सहने वाला था। उसने अपने राक्षसों को अंगद को गिरफ्तार करने का आदेश दिया परंतु कोई भी अंगद का पैर तक नहीं हिला सका। अंगद ने राक्षस सैनिकों को एक ही प्रहार में दूर कर दिया और स्वयं एक ऊंचे स्थान पर चढ़ बैठा जो रावण से सिंहासन से भी ऊंचा था। रावण के राक्षस सैनिकों में अंगद को बहुत पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह हाथ नहीं आया और वहां से निकल राम के पास जा पहुंचा। 

अंगद दरबार से निकला ही था कि गुप्तचरों ने रावण को आकर सूचना दी कि पूरी लंका को राम की वानर सेना ने घेर लिया है। राम ने भी बिना वक्त गवाएं सेना को लंका की चढ़ाई का आदेश दिया। फिर क्या था वानर वीरों ने पलक झपकते ही लंका के मुख्य द्वार को तोड़ डाला और अंदर प्रवेश कर भव्य भवनों इमारतों को तोड़ने फोड़ने लगे। राक्षस सेना में कोलाहल मच गया और राक्षस सेना टक्कर लेने के लिए आगे बढ़ी। थोड़ी ही देर में वानर सेना और राक्षस सेना एक दूसरे से टकरा गई। पल भर में सारी धरती लहूलुहान हो गई। वानर व राक्षस वीर गति को प्राप्त होने लगे। सागर का पानी खून से लाल हो गया। 

राम के बाण से राक्षसों चुन चुन कर धराशाई होते जा रहे थे। परंतु रावण पुत्र इंद्रजीत ने धनुष से नागपाश छोड़ी जिससे राम व लक्ष्मण दोनों अचेत हो गए परंतु तभी आकाश से गरुड़ विनता का यान उतरा और उसने राम लक्ष्मण का स्पर्श किया। पलक झपकते ही वे होश में आ गए और वानर सेना का उत्साह दोबारा लौट आया। 


कुंभकरण

नील द्वारा रावण के मंत्री व सेनापति प्रहस्त मारा गया जिससे राक्षस सेना में खलबली मच गई। प्रहस्त की मौत की सूचना से रावण चिंतित हो गया और ऐसे समय में उसने कुंभकरण की याद आई कुंभकरण छह मास सोता था और छह माह जागता था। राक्षसों ने कुंभकरण को जगाने के लिए ढोल नगाड़े बजाए और खूब शोर शराबा मचाया तब जाकर कुंभकरण की आंखें खुली। कुंभकरण तैयार होकर रावण से मिला और रावण ने उसे युद्ध में राम एवं लक्ष्मण को कुचलने के लिए भेज दिया। हाथों में भयंकर शस्त्र लेकर कुंभकरण युद्ध भूमि में पहुंच गया और वानर सेना पर टूट पड़ा। तब राम ने धनुष की प्रत्यंचा खींचकर कुंभकरण पर बाण छोड़ दिए आखिर कुंभकरण कब तक इतने बाणों को झेल पाता। कुंभकरण का सर कट कर दूर जा गिरा और शरीर के भी अनेक टुकड़े हो गए। राक्षस सेना में उसकी मृत्यु से मातम छा गया और सभी जगह जय श्रीराम की जय-जयकार से गूंज उठा। 


मेघनाथ

रावण को कुंभकरण पर बेहद भरोसा था उसकी मौत का समाचार सुनते ही वह शोक में डूब गया। तब रावण ने नए सिरे से युद्ध की तैयारी शुरू कर दी उसने अपने कुछ जीवित पुत्र पृथ्वीराज, देवांतक, नारांतक, अतिकाय आदि को युद्ध भूमि की ओर रवाना किया। रावण के यह सभी पुत्र मारे गए। इनके अलावा ढेर सारे राक्षस भी राम व लक्ष्मण के बाणों के आगे टिक नहीं सके। तब रावण को मेघनाद की याद आई। अब रावण को इसी पुत्र पर विजय की सारी आशाएं केंद्रित थी। मेघनाद ने उसी समय रथ सजाया और युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। 

राम ने लक्ष्मण को मेघनाद का वध करने के लिए युद्ध में भेज दिया साथ में विभीषण, हनुमान, जामवंत एवं वानर सेना भी गइ। गुस्से से मेघनाद ने बाणों की वर्षा कर दी। वहीं लक्ष्मण ने भी निशाना लगाकर मेघनाद पर बाण छोड़े। तभी मेघनाद का एक तीव्र बाण लक्ष्मण को जा लगा और वे मूर्छित होकर जमीन पर गिर पडे। राम को लक्ष्मण के मूर्छित होने का समाचार मिला तो वे विलाप करने लगे। लक्ष्मण को होश में लाने के अनेक प्रयास किए गए। तब हनुमान द्वारा लाए गए वैद्य ने संजीवनी बूटी लाने को कहा जिससे लक्ष्मण की जान बचाई जा सके। हनुमान संजीवनी बूटी लेने द्रोण पर्वत पर गए परंतु वहां अनेकों बूटियां थी तो उन्हें यह मालूम नहीं था कि संजीवनी बूटी कौन सी है। इसलिए हनुमान पूरा पर्वत उठाकर ही युद्ध भूमि में ले आए। वैद्य ने प्रात होने से पहले ही संजीवनी बूटी से लक्ष्मण को सचेत कर दिया और अगले ही दिन लक्ष्मण, मेघनाद से टक्कर लेने गए। लेकिन इस बार लक्ष्मण ने राम का नाम लेकर एक अमोघ बाण मेघनाद पर छोड़ दिया। उस बाण से मेघनाद का सिर धड़ से अलग हो गया और वह मारा गया। मेघनाद के गिरते ही रावण की सेना भाग निकली। 


रावण

मेघनाथ का मरना रावण के लिए बहुत बड़ा आघात था। एक बेटा बचा था वह भी मारा गया। अब वह उसकी मां मंदोदरी को कैसे सांत्वना दें। लंका में शोक छा गया। रावण का क्रोध, अपमान और शोक से बुरा हाल था उत्तेजना से उसका सारा शरीर कांप रहा था। अंत में रावण ने तय किया कि उसे स्वयं ही राम से टक्कर लेने युद्धभूमि जाना होगा। रथ पर सवार होकर रणक्षेत्र में आ पहुंचा। उसके साथ अनेक बलशाली राक्षस वीर और राक्षस सेना थी। रावण से पहले मुकाबला करने लक्ष्मण और रावण ने बड़ी आसानी से लक्ष्मण के बाणों को नाकामयाब कर दिया और अपना ध्यान राम पर केंद्रित किया। 

राम व रावण में घनघोर युद्ध छिड़ गया। रावण ने राम पर घातक वार छोड़ें जिनका राम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दोनों ही युद्ध की कला में निपुण थे। एक दिन इंद्र ने अपना रथ राम के लिए भेजा और सारथी मातलि भी। राम ने देवेंद्र की भेंट स्वीकार की और रथ पर सवार होकर रावण से युद्ध रत हो गए। यह भीषण युद्ध बारह दिनों तक चला। कभी राम रावण पर भारी पड़ते तो कभी रावण राम पर। राम ने अपने बाणों से रावण के अनेकों बार दसों सिर धड़ से अलग किए किंतु राम का कोई अस्त्र रावण को नहीं मार पा रहा था। उस समय विभीषण ने राम के पास आकर रावण की नाभि पर एक बार ब्रह्मास्त्र छोड़ने को कहा तब मातलि ने भी राम को ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने की सलाह दी। राम ने ब्रह्मास्त्र निकाला और मंत्रों के उच्चारण के साथ रावण पर छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र का वार अचूक था उस से बच निकलना रावण के लिए मुश्किल था। रावण के कुछ सोचने से पहले ही देखते ही देखते ब्रह्मास्त्र कवच को फोड़ कर रावण की नाभि में जा घुसा। रावण पल भर के लिए संज्ञाशून्य हो गया। उसके हथियार छूटकर जा गिरे वह लड़खड़ाता हुआ धरती पर आ गिरा। उसकी सांसे उखड़ने लगी और वह अंतिम सांसें गिनने लगा। 

लंका में सन्नाटा छा गया। मंदोदरी ने तत्काल राक्षसों को साथ लिया और रोती हुई रणक्षेत्र में पहुंची। मंदोदरी के करुण विलाप से वहां खड़े लोगों का हृदय पसीजने लगा। राम नीतिवान थे। रावण के गिरते ही उन्होंने युद्ध स्थगित कर दिया। विभीषण भी अपने बड़े भाई की मृत्यु पर अत्यंत दुखी थे क्योंकि था तो वह रावण का भाइ ही। राम ने आगे बढ़कर विभीषण को बाहों में लिया और उसके अश्रु पोछे और कहा, रावण वीर था तो और उसने वीरता से युद्ध लड़ा। निश्चित है कि वह मरणोपरांत स्वर्ग में स्थान पाएगा। 

रावण ने मरने से पहले विभीषण को राजनीति के अनेकों गुर समझाएं और उसके बाद अंतिम सांसें ली। अंत में समुद्र तट पर राक्षस राज रावण का विधिवत अंतिम संस्कार किया गया। इस प्रकार युद्ध का अंत हो गया। राम ने लंका का राज विभीषण को सौंप दिया। विभीषण का विधिवत राज्याभिषेक हुआ और रावण के बाद लंका के नए नरेश विभीषण बने। 


अग्नि परीक्षा

राम को सीता की चिंता थी सीता अभी तक अशोक वाटिका में ही थी। राम ने हनुमान से कहा, हे पवनसुत राजा विभीषण से आदेश लेकर अशोक वाटिका जाओ और सीता को समस्त समाचार सुनाओ। शीघ्र ही मै उससे मिलूंगा। उनसे कहो नहा धोकर व नए वस्त्र आभूषण धारण करें फिर मेरे पास आए। 

जब सीता को यह पता चला कि उन्हें पूर्ण वस्त्र व आभूषण धारण करके ही राम के सामने आना है उसे थोड़ा अटपटा लगा। पर वे इंकार कैसे करती। उन्होंने अच्छी तरह स्नान किया और नवीन वस्त्र पहने और भव्य आभूषणों से सजकर तैयार हो गई और एक पालकी में बैठाकर सीता को राम के सम्मुख लाया गया। चारों ओर खड़े वानर सीता के दर्शन पाकर कृतकृत्य हो रहे थे। राम ने भी सीता के दर्शनों से किसी को नहीं रोका। 

सीता हैरान थी कि यह राम का कैसा व्यवहार है। सीता धीमे कदमों से राम के पास पहुंची और जोर जोर से रो पड़ी। राम ने आगे बढ़कर सीता को आलिंगन में लिया और गंभीर स्वर में कहा, सीते मुझे खुशी है कि मैंने जो प्रतिज्ञा की थी उसे पूरा कर सका। अब तुम कैद से मुक्त हो चुकी हो और आज तुम मेरे सामने खड़ी हो किंतु तुम्हें स्वीकारते मेरा हृदय झिझक रहा है। तुम इतने दिन यहां रही लोग न जाने कैसी कैसी बातें उड़ाएंगे। इस हालत में मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूं। 

सीता तो मधुर स्वर सुनने की आस में व्याकुल थी और कहां राम के कटु वचन निकल रहे थे। सीता तेज स्वर में बोली, मैने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन मुझे आपसे ऐसे वचन सुनने पड़ेंगे। ऐसा लांछन सुनकर मेरा दिल टूट चुका है। यह कौन नहीं जानता कि रावण मुझे यहां बल से उठा लाया था फिर आप मुझ पर शंका कर रहे हैं। लक्ष्मण सुनो अब मैं एक पल भी जिंदा नहीं रहना चाहती मेरे लिए अग्नि प्रज्ज्वलित करो मैं अभी आग में प्रवेश करूंगी। 

लक्ष्मण के सामने अग्नि प्रज्ज्वलित करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। लक्ष्मण ने सोचा अच्छा है ऐसा लांछन जीवन बिताने से उचित तो यही है कि सीता माता अग्नि में ही प्रविष्ठ हो जाएं। अग्नि की ज्वाला आकाश को छूने लगी। सीता हाथ जोड़ पति के चारों ओर एक बार घूमी और फिर बिना किसी की और देखे बोली, सभी देवताओं को मेरा नमन। हे अग्नि आज मेरी पवित्रता पर संदेह किया जा रहा है अगर तुम्हें भी संदेह हो तो मुझे स्वीकार करो। 

यह कहते ही सीता जलती हुई आग में प्रविष्ट हो गई। तभी सारे देवता वहां उतर आए और अचानक प्रज्ज्वलित अग्नि से अग्नि देव प्रकट हुए उनके साथ साथ साथ सीता थी। वैसी ही जैसी अग्नि में प्रविष्ट हुई थी। अग्निदेव ने राम को सीता सौंपते हुए कहा- हे राम सीता पवित्र है इन पर संदेह मत करो। 

इतना सुनते ही राम के चेहरे पर हर्ष छा गया। सच तो यह था कि वह आम जनता को सीता की वास्तविकता से परिचित कराना चाहते थे। उन्होंने आगे बढ़कर सीता को आलिंगन में ले लिया और बोले, प्रिय, तुम पर मुझे कभी संदेह नहीं रहा, बस लोगों द्वारा इस तरह की बातें होने के डर से मैने तुम्हारी परीक्षा ली थी ताकि भविष्य में कभी किसी को तुम पर शक न हो। क्या मैं नहीं जानता कि तुम कितनी पवित्र हो। यह मैंने तुम्हारे लिए ही किया है सीते। मेरे वचनों से तुम्हें जो कष्ट हुआ उसका मुझे दुख है। सीता धन्य हुई। उसका सुहाग उसे वापस मिल गया था। 

राम का वनवास समाप्त होने को था। राम को भरत की बड़ी चिंता थी न जाने भरत अयोध्या में कैसा समय व्यतीत कर रहे होंगे। लंका में उनका काम समाप्त हो गया था और एक दिन उन्होंने विभीषण से लंका से विदा होने की अनुमति चाही। विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान सौंप दिया। राम, सीता, लक्ष्मण के अलावा समस्त वानर पुष्पक विमान पर सवार हुए और अयोध्या की ओर उड़ान भरी। हनुमान को पहले ही अयोध्या भेज दिया ताकि वे भरत को उनके आगमन की सूचना दे दें। इस प्रकार सीता एवं राम का मिलाप होने के पश्चात उनका वनवास भी समाप्त हो चुका था और वे अयोध्या पहुंच रहे थे। 


अंत 

अयोध्या में भरत बड़ी व्याकुलता से राम की प्रतीक्षा कर रहे थे। भरत यथाशीघ्र राज्य की जिम्मेदारी राम को सौंप कर बरी होना चाहते थे। राम का आगमन हुआ। पुष्पक विमान नीचे उतरा, पूरा अयोध्या राम के जयघोष से गूंज उठा। एक दिन शुभ मुहूर्त निकाला और राम को सिंहासन पर आसीन किया गया। राम ने राज्य संभालते ही शासन की ओर विशेष ध्यान दिया। उनके राज्य में बकरी और सिंह एक घाट पर पानी पीते थे। सभी निवासी एक दूसरे से मिल जुल कर रहते थे, आपस में लड़ाई झगड़ा कोई नहीं करता था, दुराचार का तो नाम ही नहीं था, सभी पाप कर्मों की भावना से परे थे, सभी संपन्न थे। 

वक्त गुजरा राम को राज्य संभालते हुए सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गए और एक दिन यमराज मुनि के भेष में राम से मिलने पहुंचे और बोले, प्रभु मैं यमराज हूं ब्रह्मा जी ने कहला भेजा है कि आपने जिस हेतु अवतार लिया था वह पूर्ण हुआ अब मानव देह त्याग कर बैकुंठधाम पहुंचे। 

राम बोले हे महाराज, मेरा हेतु समाप्त हुआ मुझे तो आपकी ही प्रतीक्षा थी आप जाइए मैं प्रस्तुत हो रहा हूं। राम ने एक दिन मंत्रियों को एकत्र किया और कहा कि मुझे बैकुंठधाम जाना है। सारे नगर में खबर फैल गई कि राम ने महाप्रयाण का निश्चय कर लिया है। फिर क्या था सारे अयोध्यावासी जैसे हाल में थे उसी हाल में दौड़ते हुए महल जा पहुंचे। लोगों का अपने पति यह प्यार देखकर राम कृतार्थ हुए और बोले, अंतिम समय में तुम लोग मुझसे क्या चाहते हो, मैं तुम लोगों की मनोकामना पूर्ण करूंगा। 

अयोध्यावासी बोले प्रभु हमारी तो अब एक यही मनोकामना है कि हमें भी आप अपने साथ ले चलें। राम ने कहा, तथास्तु। और उनकी बात स्वीकार कर ली। राम ने लव कुश को दरबार में बुलाया। कुश को कोशल का राज्य सौंपा और लव को उत्तर कोशल का और सभी सरयू नदी के तट पर पहुंचे। लक्ष्मण भी वही उनकी प्रतीक्षा में थे। किष्किंधा पुरी से सुग्रीव भी परिवार सहित आ पहुंचे थे। राम सहित सभी सरयू नदी में उतर गए। मंत्रोच्चारण के साथ सभी ने स्नान किया तभी आकाश से देवताओं के भेजे विमान आ गए। उन पर बैठकर राम सहित सभी लोग बैकुंठधाम को रवाना हो गए। चारों और मंद मंद समीर बह रहा था पुष्प वृष्टि हो रही थी विशाल विमान धीरे-धीरे आकाश में विलीन होता जा रहा था। 


रामायण 20 मिनट में

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