बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत कथा

॥ बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत कथा ॥ 

Brihaspativar Guruvar Vrat Katha

» बृहस्पतिवार व्रत विधि 

* किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए। 
* नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न अनिष्ट नष्ट होता है, धन विद्या का लाभ होता है। 
* सूर्योदय से पहले उठकर स्नान से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर बृहस्पतिवार की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गन्ध-पुष्प और अक्षत से विधि-विधान से पूजन करें। 
* इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें। धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग । विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तु ते ॥ 
* तत्पश्चात आरती कर व्रत कथा सुनें। 
* बृहस्पतिवार के व्रत में कन्दली फल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है। 
* भोजन दिन रात में एक ही बार नमक रहित करना चाहिए। वह भी चने की दाल का होना चाहिए। 


॥ ब्रहस्पतिवार व्रत कथा - १ ॥ 

प्राचीन समय में एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी। एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पति देव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पति देव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। 

बृहस्पति देव ने कहा, हे देवी, संतान और धन से कोई दुखी होता है? अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यो में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पति देव अंतर्ध्यान हो गए। 

व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। 

एक दिन वह एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। तभी वहां बृहस्पति देव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले हे मनुष्य, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है किन्तु तुम गुरुवार के दिन बृहस्पति देव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे। 

उसने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया। 

अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलम्ब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ और राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधि पूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे। 

बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो। बृहस्पति देव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली भाई मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी। 

वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पति देव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह अपने घर गई। अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया। 

उसी रात बृहस्पति देव राजा के सपने में आए और बोले हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है। 


दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवा कर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए। बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार व्यापारी अपने नगर को चल दिया। 


॥ ब्रहस्पतिवार व्रत कथा - २॥ 

भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन बृहस्पति देव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा माँगी। रानी ने कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। 

साधु ने कहा: पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। परन्तु यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, ऐसा करने से सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर साधु आलोप हो गये । 

साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने कहा कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। राजा परदेश जाकर जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। एक बार रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। 

उधर, रानी की बहिन कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी? 

रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पति देव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। 

बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहिन व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई। 

सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आई। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई। रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा। 

एक दिन राजा जब अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला मन्दिर आदि बन गई हैं। जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आ रहे हैं, तो उन्होंने बांदी से कहा कि राजा को लिवा लाए। आज्ञानुसार दासी राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई। तब राजा ने रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा: हमें यह सब धन बृहस्पति देव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। 

राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परन्तु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कथा किया करूँगा। अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बँधी रहती तथा दिन में तीन बार कहानी कहता| एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहिन के यहाँ हो आवें। इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहिन के यहाँ को चलने लगा। मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा: अरे भाइयों! मेरी बृहस्पति देव की कथा सुन लो। 

कुछ आदमी बोले: अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे। राजा ने कथा कही जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मुर्दा मनुष्य उठकर खड़ा हो गया। आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला। राजा ने उसे कथा सुनने को बोला। किसान ने मना कर दिया। राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा। उस समय उसकी माँ रोटी लेकर आई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी। राजा ने कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़ हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया। 

राजा अपनी बहिन के घर पहुँचा। बहिन ने भाई की खूब मेहमानी की। दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं। राजा ने अपनी बहिन से कहा: ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले। 

बहिन बोली: हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं। अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आवें। वह ऐसा कहकर देखने गई वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था। अतः किसी ने भोजन नहीं किया था। राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक हो गया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी। 

एक रोज राजा ने अपनी बहिन से कहा कि वह भी साथ घर चले। राजा की बहिन की सास ने कहा हाँ चली जा। परन्तु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है। यह जानकर राजा बड़े दुःखी मन से अपने नगर को लौट आया। 

राजा ने अपनी रानी से कहा: हम निरवंशी हैं और कुछ भोजन आदि नहीं किया। रानी बोली: हे प्रभो! बृहस्पति देव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे। 

उसी रात को बृहस्पति देव ने राजा से स्वप्न में कहा: हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है। राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई। नवें महीने एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ। जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई, तभी रानी ने कहा: घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई। राजा की बहिन बोली भाभी मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती। बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएँ हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावना पूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढता है, अथवा सुनता है, दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं। 


॥ ब्रहस्पतिवार व्रत कथा - ३॥ 

प्राचीन काल में एक निर्धन ब्राहमण था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी। किसी देवता का पूजन न करती। बेचारे ब्राह्मण देवता बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कुछ परिणाम न निकला। भगवान की कृपा से ब्राह्मण के कन्या रूपी रत्न पैदा हुआ। कन्या बड़ी होने पर प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप व बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी। अपने पूजन-पाठ को समाप्त करके अपनी मुट्ठी में जौ भरके पाठशाला के मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के हो जाते लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी। 

एक दिन वह बालिका सूप में उस सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि उसके पिता ने देख लिया और कहा - हे बेटी! सोने के जी के लिए सोने का सूप होना चाहिए। दूसरे दिन बृहस्पतिवार था इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पति देव से प्रार्थना करके कहा - मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो। बृहस्पति देव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। रोजाना की तरह जब लोटकर जौ बीन रही थी तो सोने का सूप मिला। 

एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला। इस कन्या के रूप और कार्य को देखकर मोहित हो गया। अपने पिता से राजकुमार बोला- मैं उस लड़की से विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। राजकुमार ने उस लडकी के घर का पता बतलाया। तब मंत्री उस लडकी के घर गए और ब्राहमण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गए तथा विधि-विधान के अनुसार ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया। 

कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री के पास गए। बेटी ने पिता की दुःखी अवस्था को देखा और बोली - हे पिताजी! आप माताजी को यहां लिवा लाओ। मैं उसे विधि बता दूंगी जिससे गरीबी दूर हो जाए। वह ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो अपनी मां को समझाने लगी- हे मां तुम प्रातःकाल प्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जावेगी। फिर उसकी मां प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी। इस व्रत के प्रभाव से उसके मां बाप बहुत ही धनवान और पुत्रवान हो गए और बृहस्पति जी के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए। 


॥ गुरु प्रदोष व्रत कथा ॥ 

एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ। मायावी आसुर ने आसुरी माया से उसने भयंकर विकराल रूप धारण कर लिया। उसके स्वरुप को देख इन्द्रादिक सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे। बृहस्पति महाराज बोले - वृत्रासुर पूर्व समय में चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहां शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख उपहास पूर्वक बोला - हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं। किन्तु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगन बद्ध हो सभा में बैठे। चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव हंसकर बोले - हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक हैं। 

माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ की ओर देखती हुई कहने लगी - अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है। अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा - अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं। जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना। वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो। 

देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शान्ति छा गई। 


॥ बृहस्पतिवार की आरती ॥ 

* ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा । छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा ॥ 
* तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी । जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ 
* चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता । सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥ 
* तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े । प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े ॥ 
* दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी । पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥ 
* सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो। विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥ 
* जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे । जेष्टानंद बंद सो-सो निश्चय पावे ॥ 

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